Thursday, July 22, 2010

ज़माने के साथ बदलता पहाड़ी संगीत
आज ज़माने के साथ बदलता जा रहा है पहाड़ी संगीत. कई इनसे गीत संगीत सुनाई दे रहा है जो अगर बोली छोड़ दे तो कहीं से भी पहाड़ी अस्तित्व नहीं दिखाई देता. आजकल गीतों में मौलिक आवाज़ की जगह एक पतली एवं फटी आवाज़ सुनाई देती है जो की हर एल्बम में १ गाने में जरूर होती है. क्या यह बदलता स्वरुप हम लोगों ने स्वीकार कर लिया है. या फिर इसको इस सस्ती लोकप्रियता कहेंगे जो की गायक कर रहे हैं... कुछ गीत इसके उदहारण है.फुर्की बांद लबरा छोरी, छेकना बांध,लीला घसियारी ..क्या है ये कोई गीत है क्या ये तो सरासर अपमान है अपने बहु बेटियों का ... क्या आपको लगता है की ये गाने सही है ? ये कोन सा बोली हुई फुर्की बांध,लीला गसियारी , इस तरीके की बोली आजकल के गायक बोल रहे है और हम लोग भी मस्त होकर सुनते है एन्जॉय करते है क्यों एषा क्यों हो रहा है हमारे पहाड़ी समाज में .... क्या ... आखिर इसका क्या कारण है क्यों हो रहा है ये सब .....

हिमांशु बिष्ट


एक
समय था जब शादी या फिर दूसरी पार्टियों में डीजे पर सबसे ज्यादा हिंदी डांस नंबर्स बजाए जाते थे. समय बदला और इंग्लिश डांस नंबर्स का एक खास श्रोता वर्ग उभर आया. लेकिन जब हर तरह के म्यूजिक के साथ एक्सपेरिमेंट हो रहे हैं, तो भला फोक क्यों पीछे रहे. इन दिनों गढ़वाली-कुमाऊंनी रीमिक्स डांस नंबर्स डीजे पर सबसे ज्यादा बजाए जा रहे हैं और थिरकने की चाह पाले श्रोता इन्हें पसंद भी कर रहे हैं. युवाओं की खास च्वॉइसगजेंद्र राणा का गाया गढ़वाली गीत तू लगदी झकास हो या फिर मंगलेश डंगवाल का चढ़दी जवानी तेरी मस्त शिवानी युवाओं की खास च्वॉइस लिस्ट में शामिल हैं. कैसेट विक्रेताओं का कहना है कि एक समय था, जब युवा अक्सर गढ़वाली-कुमाऊंनी जैसे रिजनल सांग्स से दूर ही रहा करते थे, या फिर सेलेक्टेड नंबर्स ही पसंद किया करते थे, लेकिन अब रिजनल सांग्स का एक खास श्रोता वर्ग है. फोक सांग्स के साथ किया जाने वाला एक्सपेरिमेंट लोगों को काफी पसंद आ रहा है. बदलाव की बयारसागर म्यूजिक हट के ओनर कमल लोनियाल बताते हैं कि इन दिनों हर तरह के म्यूजिक में एक्सपेरिमेंट्स किए जा रहे हैं. गढ़वाली और कुमाऊंनी सांग्स में भी पहले की अपेक्षा काफी अंतर आ गया है. फिर चाहे वह ऑडियो हो या फिर वीडिओ. कमल लोनियाल बताते हैं कि कैसेट सीडीज के मार्केट में लगभग 30 परसेंट मार्केट रिजनल सांग्स का है. कमल बताते हैं कि शादी, पार्टीज में गढ़वाली-कुमांऊनी के फास्ट रिदमिक सांग्स को काफी पसंद किया जाता है, लेकिन जो लोग प्योर फोक म्यूजिक सांग्स सुनना चाहते हैं, उनका एक अलग ग्रुप है. ट्रेडिशनल फोक के लिसनर ग्रुप में नरेंद्र सिंह नेगी, प्रीतम भरतवाण व मीना राणा को पसंद किया जाता है. वहीं युवाओं में गजेंद्र राणा, मंगलेश डंगवाल और मास्टर रोहित की ऑडियो और वीडियो सीडी पसंद किया जाता है

Tuesday, July 20, 2010


मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू, मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू, हे कुलै की डालि

कखि तिन मेरि आख्यूं का सुपिन्या, देखि त नि यालि
मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू, हे कुलै की डालि
कखि तिन मेरि आख्यूं का सुपिन्या, देखि त नि यालि
मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू

त्वै मां बोदु हे दगड़िया, मन की गैंड़ खोलि, त्वै मां बोदु हे दगड़िया, मन की गैंड़ खोलि
ब्योला बणि वो सुपिन्या मां आई, तू कैमां ना बोलि
छुंयाल घसैलि सुणालि- छुंयाल घसैलि सुणालि, बात फैलि जालि
मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू, हे कुलै की डालि, मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू…..

हे घुघति, घिन्दुड़ि, हे हिलांसि, तू भी भुलि ना जैई, हे घुघति, घिन्दुड़ि, हे हिलांसि, तू भी भुलि ना जैई
मुण्ड बदौणु मेरा ब्यो मां दगड़्या, टक्क लगै की ऐई
न्यूंति बुलोंलु, पुजि पठ्यौंलु – न्यूंति बुलोंलु, पुजि पठ्यौंलु, मिन पैलि बोल्यालि
मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू, हे कुलै की डालि, मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू…..

कुतग्यालि सि लगणि तन-मन मां, सोचि सोचि लाज, कुतग्यालि सि लगणि तन-मन मां, सोचि सोचि लाज
घासन क्यैकि पूरी ह्वैनि, गैठ्याई डांनि आज
सैरि दुन्या अपणी ह्वै ग्याई-सैरि दुन्या अपणी ह्वै ग्याई, बिराणी छै जा ब्यालि
मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू, हे कुलै की डालि, मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू…..

सासु मयैल्यू मेरि ससुरा जी द्याब्ता, भलि-भलि नणद जेठाणि,सासु मयैल्यू मेरि ससुरा जी द्याब्ता, भलि-भलि नणद जेठाणि
बिसरि ना ज्यूं त्वै यना सैसुर में, दगड़्या बुरु ना मानि
भाग मां होलु चा नि होलु – भाग मां होलु चा नि होलु, सुपिन्या त देखि यालि
मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू, हे कुलै की डालि, कखि तिन मेरि आख्यूं का सुपिन्या, देखि त नि यालि
मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू……।


अरे चीड़ की डाली तू ऐसे मन्द-मन्द क्यूँ मुस्कुरा रही है, कहीं तूने मेरी आंखों में तैर रहे सपने देख तो नहीं लिये हैं? अरे अब मैं तुझ से क्या छुपाऊं, मैं अपनी दिल की गांठ अब तेरे सामने खोल ही देती हूँ. कल “वो” दूल्हा बन कर मेरे सपने में आये थे, लेकिन तू यह बात किसी को बताना मत। अगर यह बात घास काटने वाली बातूनी महिलाओं ने सुन ली तो यह बात फैल जायेगी।

जंगल में पाये जाने वाली विभिन्न प्रकार के पक्षियों को संबोधित करते हुए युवती कहती है – हे घुघुती, हे घिन्दुड़ी, हे हिलांसी तुम लोग भी भूलना नहीं। मैं तुम सब को न्यौता भिजवाउंगी, तुम सब मेरी शादी में जरूर आना।

मेरे तन-मन में हल्की गुदगुदी सी लग रही है, और यह सब सोच-सोच कर मुझे शरम भी आ रही है। कल तक जो दुनिया पराई थी वो आज अचानक अपनी सी लगने लगी है। मैने सपने में देखा कि मेरी सासू जी बहुत प्यार करने वाली हैं और ससुर जी तो देवता समान हैं, ननद-जेठानी भी अच्छी हैं। अब ऐसे ससुराल में जाकर अगर में तुम सब साथियों को भूल भी जाऊं तो आशा है कि तुम लोगों को बुरा नहीं लगेगा। अब यह सब बातें सच होंगी या नहीं, क्या पता? लेकिन मैने सपना तो देख ही लिया है।


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Saturday, July 17, 2010


हरियाला सावन ढोल बजाता आया हरियाला सावन ढोल बजाता आया धिन तक तक मन के मोर नचाता आया मिट्टी में जान जगाता आया को: धरती पहनेगी हरी चुनरिया बनके दुल्हनिया .......हरियाला सावन ढोल बजाता आया हरियाला सावन ढोल बजाता आया...........

Thursday, July 15, 2010


"आज फिर से मुझे (हिमांशु) अपना बचपन याद आया"

आज सुबह सुबह जेसे हि में (हिमांशु बिष्ट ) उठा गाव से माँ का फोन आ गया की आज से सावन का महीना सुरु हो गया है,
माँ मुझसे बोली की जल्दी उठ जा और नहा धो कर पूजा पाठ कर ले ..और सायद घर पे टीवी चल रहा था और टीवी में ये गाना चल रहा था, " सावन का महिना पवन करे शोर मोरा जियरा ऐसे नाचे जैसे नाचे मोर " तो यह पुराना गाना सुनकर तबियत खुश हो गई की सावन तो आ गया है . पर तबके सावन और अबके सावन के विषय में सोचने को मजबूर हो गया की तबके सावनो में जोरदार बारिश होती थी और तेज हवाए चलती थी और सररर सररर सन्न्न करती हुई खूब शोर किया करती थी . तेज बारिश के बीच झूला झूलने का आनंद ही कुछ और होता था . समय बदलने के साथ साथ लगता है की सावन भी बदल गया है न तेज जोरदार हवाए चलती है और न जोरदार बारिश होती है . अब तो ऐसा आभास होता है की सावन बारिश के वगैर सूना सूना सा है . भविष्य में सावन के महीने में हरियाली का वातावरण बनाने के लिए और जियरा को खुश करने के लिए और मनवा को मोर जैसे नचाने के लिए कहीं कृत्रिम बारिश का सहारा न लेना पड़े.....
अब तो अपने पहाड़ से दूर होकर ..... मुझे वो दिन याद आते है जब सावन के महीने में वो मुसलाधार बारिस , नदी अपनी चरम सीमा पे और बदलो की गर्जना , थर-थर काप जाता था में ..... थोड़ी देर बाद जब धुप निकलती तो दोस्तों के साथ खेलने चला जाता था ... गुल्ली डंडा । तब हमारा सबसे अछा खेल था.... लेकिन अब कहा ... आज मुझे फिर से अपना बचपन याद आ गया ... माँ मुझे भट (सोयाबीन) भूनकर देती ... मेरी जेब में भर कर देती ... आगे लिखने में असमर्थ हूँ! "अब मेरी आंखे नम हो चुकी है,,,,..... आज फिर से मुझे अपना बचपन और माँ की वो यादें त
जा हो गयी".......
हिमांशु बिष्ट

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Tuesday, July 13, 2010


प्राकृतिक सुंदरता से ओतप्रोत औली भारत (उत्तराखंड) का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। सूर्य की किरणें जब यहाँ की पर्वतों की श्रंखला पर पड़ती हैं तो उसकी चमक देखते ही बनती है। बर्फ से खेलने का आनंद कुछ और ही है। दिसम्बर से लेकर मार्च तक प्रकृति अपने सुड़ौल रूप में रहती है। नीले गगन के नीचे हरियाली बर्फ से ढँकी हुई रहती है।

बद्रीनाथ से तीस किलोमीटर पहले आता है जोशीमठ। जोशीमठ से सोलह किलोमीटर दूर है भारत का सबसे अच्छा स्की रिजोर्ट औली। औली की ढलानो को भारत ही नहीं दुनिया की सबसे अच्छी ढलानों में शुमार किया जाता है। जोशीमठ दिल्ली से पाँच सौ किलोमीटर और हरिद्वार से तीन सौ किलोमीटर दूर है।

यहां नवम्बर से मार्च तक स्की का मजा लिया जा सकता है। औली बर्फ पिघलने के बाद भी इतना ही खुबसूरत रहता है। गर्मी के मौसम में यहां ढलाने घास के ढक जाती हैं। इन घास के मैदानों को गढवाल में बुग्याल कहा जाता है।

जोशीमठ से यहां तक जाने के लिए सडक तो है ही आप चाहें तो रोप वे से भी जा सकते हैं। इस चार किलोमीटर लम्बे रोप वे से यहां की खूबसूरती को आसानी से देखा जा सकता है। औली की तस्वारो में देखिये इसकी दिव्य सुन्दरता को..............

प्राकृतिक सुंदरता से ओतप्रोत औली भारत (उत्तराखंड) का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। सूर्य की किरणें जब यहाँ की पर्वतों की श्रंखला पर पड़ती हैं तो उसकी चमक देखते ही बनती है। बर्फ से खेलने का आनंद कुछ और ही है। दिसम्बर से लेकर मार्च तक प्रकृति अपने सुड़ौल रूप में रहती है। नीले गगन के नीचे हरियाली बर्फ से ढँकी हुई रहती है।

यहां पर कपास जैसी मुलायम बर्फ पड़ती है और पर्यटक खासकर बच्चे इस बर्फ में खूब खेलते हैं। औली में प्रकृति ने अपने सौन्दर्य को खुल कर बिखेरा है। बर्फ से ढकी चोटियों और ढलानों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। स्थानीय लोग जोशीमठ और औली के बीच केबल कार स्थापित करना चाहते हैं। जिससे आने-जाने में सुविधा हो और समय की भी बचत हो। इस केबल कार को बलतु और देवदार के जंगलो के ऊपर से बनाया जाएगा। यात्रा करते समय आपको गहरी ढ़लानों और ऊंची चढाई चढ़नी पड़तीं है। यहां पर सबसे गहरी ढलान 1,640 फुट पर और सबसे ऊंची चढा़ई 2,620 फुट पर है। पैदल यात्रा के अलावा यहां पर चेयर लिफ्ट का विकल्प भी है।


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मूल मूल के तू हसनी छे हे निमो की दांडी.....

कन छीन मेरा पहाड़ का हाल या
केन नि जाडी ....

जरा त्वे ता बातो निमो की दांडी की क्या ची होनु मेरा
पहाड़ माँ ....

में ता छो आयु नोकरी कन अपना पहाड़ ते छोड़की......

मूल
मूल के तू हसनी छे हे निमो की दांडी.......

Monday, July 12, 2010

नयु-नयु ब्यो च मीठी-मिठि छुईं लगौंला
पत्नी अपनेपति से कहतीहै की अजीसुनिये! आप इतनी जल्दीबाजी मतकरिये। हमारी नयी-नयी शादी है, हम धीरे-धीरे मीठी मीठी बातें करतेहुए जायेंगे। पति कहता है कि अजीनहीं तुम तेज तेज चलो, हम लोगजल्दी-जल्दी जायेंगे और इन बातोंको हम घर पर पहुंच कर आराम सेकरेंगे।

पत्नी बहाना बनाते हुए कहती है किअब तुम ही बताओ मैं तेज तेज कैसेचल पाउंगी, मेरे इतने ऊंचे सैण्डलहैं, यह चढ़ाई वाला ऊंचा रास्ता है, और गर्मी के दिन है। चलो ऐसाकरते हैं कि हम दोनों लोग किसीपेड़ की छाया में बैठ जाते हैं, औरफिर मीठी मीठी बातें करते हैंआखिर हमारी नयी नयी शादी हुईहै।
दोनों की नयी- नयी शादी हुईलड़की सैंडल पहन के पहाड़ी रश्तोंपर चलने में असमर्थ है
..
भावार्थ - पति समझाते हुए कहताहै कि अब तुम ज्यादा फैशन कीबातें ना करो, जल्दी-जल्दी चलो, यदि सैण्डल से परेशानी हो रही हैतो सैण्डल अपने बटुए में रख लोऔर नंगे पैर ही चलो, अगर हमलोग जल्दी घर नहीं पहुंचे तो यहींभूखे मर जायेंगे, इसलियेजल्दी-जल्दी चलते हैं और इनबातों को घर पर पहुंच कर आरामसे करेंगे।

पत्नी झूठा गुस्सा करते हुए कहती हैकि तुम तो सिर्फ बात ही करने वालेलगते हो, तुम बहुत बड़े कन्जूसहो,मुझे पैदल वाले रास्ते से ले आयेइससे तो अच्छा होता कि हमआराम से गाड़ी की पिछली सीट परबैठ कर यात्रा करते, अब चलो आओथोड़ा नीचे बैठो, और फिर मीठीमीठी बातें करते हैं आखिर हमारीनयी नयी शादी हुई है।

पति फिर समझाता है कि कलपरसों से तुम्हें खेतों पर काम करनेजाना होगा, तुम अपने इन कोमलहाथ पैरों से कैसे खा पाओगीगुजर-बसर करोगी), जब इस भरीजवानी में ही तुम्हारे यह हाल है तोपता नहीं बुढापे में तुम्हारा क्याहोगा? अब तुम तेज तेज चलो, हमलोग जल्दी-जल्दी जायेंगे और इनबातों को हम घर पर पहुंच करआराम से करेंगे।
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Bisht G
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