Tuesday, September 20, 2011

जल्दी नहीं पिघलेंगें हिमालय के ग्लेशियर

जल्दी नहीं पिघलेंगें हिमालय के ग्लेशियर

विश्व के लिए अच्छी ख़बर लेकिन आईपीसीसी के लिए बुरी. जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी के कुछ वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि 2035 तक हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे. यह दावा ग़लत निकला.

भारत के डॉ राजेंद्र पचौरी की अगुवाई में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित आईपीसीसी को अब अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. आईपीसीसी की चेतावनी न्यू सांइंटिस्ट नाम की पत्रिका के एक लेख पर आधारित थी जो 1999 में प्रकाशित की गई थी. 2007 में जारी की गई उस रिपोर्ट में आईपीसीसी ने कहा था कि हिमालय के ग्लेशियर 2035 तक पूरी तरह पिघल जाएंगे.

इस भविष्यवाणी के बाद पानी के अभाव और जलवायु में भारी बदलाव की अटकलों ने एक नया पैमाना ले लिया और अंतरराष्ट्रीय बैठकों का केंद्रीय मुद्दा बन गई.ग़लत निकला दावाBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: ग़लत निकला दावा

लापरवाही इस हद की थी कि न्यू साइंटिस्ट की रिपोर्ट दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ सैयद हस्नैन से टेलीफ़ोन पर बातचीत पर आधारित थी. डॉ हस्नैन ने अब भी इस बात को मानते हैं कि यह महज़ एक विचार था और इस पर किसी भी तरह का संशोधन नहीं हुआ था.

सच्चाई सामने आने के बाद ग्लेशियर वैज्ञानिकों ने आईपीपीसी और उसके दावे की निंदा की है और कहा है कि हिमालय के कई ग्लेशियर औसतन 300 मीटर मोटे हैं और कई किलोमीटर लंबे हैं. इन्हें पूरी तरह पिघलने में 60 साल तक लग सकते हैं. डॉ पचौरी ने पहले दूसरे धड़े के वैज्ञानिकों के दावों को 'जादू-टोना विज्ञान' कहते हुए खारिज किया था. फ़िलहाल आईपीसीसी ने इस मामले पर अब तक कोई बयान नहीं दिया है. सोचने वाली बात यह है कि आईपीसीसी का गठन संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यूनेप के तहत जलवायु परिवर्तन संशोधन में सबसे उम्दा सलाह हासिल करने के लिए किया गया था.

रिपोर्टः एजेंसियां/ एम गोपालकृष्णन

संपादनः ओ सिंह

क्यों आते है हिमालय में ज्यादा भूकंप

भारत लगातार भूगर्भीय बदलावों से गुजर रहा है. भारतीय प्लेट हर साल एशिया के भीतर धंस रही है. यह सब हिमालयी क्षेत्र में हो रहा है. इन्हीं अंदरूनी बदलावों की वजह से वहां भूकंप का खतरा लगातार बना रहता है.

जमीन के भीतर मची उथल पुथल बताती है कि भारत हर साल करीब 47 मिलीमीटर खिसक कर मध्य एशिया की तरफ बढ़ रहा है. करोड़ों साल पहले भारत एशिया में नहीं था. भारत एक बड़े द्वीप की तरह समुद्र में 6,000 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक तैरता हुआ यूरेशिया टेक्टॉनिक प्लेट से टकराया. करीबन साढ़े पांच करोड़ साल से पहले हुई वह टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि हिमालय का निर्माण हुआ. हिमालय दुनिया की सबसे कम उम्र की पर्वत श्रृंखला है.

भारतीय प्लेट अब भी एशिया की तरफ ताकतवर ढंग से घुसने की कोशिश कर रही है. वैज्ञानिक अनुमान है कि यह भूगर्भीय बदलाव ही हिमालयी क्षेत्र को भूकंप के प्रति अति संवेदनशील बनाते हैं. दोनों प्लेटें एक दूसरे पर जोर डाल रही है, इसकी वजह से क्षेत्र में अस्थिरता बनी रहती है.Bildunterschrift:

विज्ञान मामलों की पत्रिका 'नेचर जियोसाइंस' के मुतबिक अंदरूनी बदलाव एक खिंचाव की स्थिति पैदा कर रहे हैं. इस खिंचाव की वजह से ही भारतीय प्लेट यूरेशिया की ओर खिंच रही है. आम तौर पर टक्कर के बाद दो प्लेटें स्थिर हो जाती हैं. आश्चर्य इस बात पर है कि आखिर भारतीय प्लेट स्थिर क्यों नहीं हुई.

'अंडरवर्ल्ड कोड' नाम के सॉफ्टवेयर के जरिए करोड़ों साल पहले हुई उस टक्कर को समझने की कोशिश की जा रही है. सॉफ्टवेयर में आंकड़े भर कर यह देखा जा रहा है कि टक्कर से पहले और उसके बाद स्थिति में कैसे बदलाव हुए. उन बदलावों की भौतिक ताकत कितनी थी. अब तक यह पता चला है कि भारतीय प्लेट की सतह का घनत्व, भीतरी जमीन से ज्यादा है. इसी कारण भारत एशिया की तरफ बढ़ रहा है.Die Bhagirathi (Hindi: भागीरथी Bhāgīrathī) ist der größte Zufluss des Ganges in Indien. Ihre Quelle, Gaumukh genannt, befindet sich im Himalaya im Bundesstaat Uttarakhand. Nach dem Zusammenfluss der Bhagirathi mit der Alaknanda wird der Fluss Ganges genannt. Die Bhagirathi wird in der Tehri-Talsperre zur Energiegewinnung und Bewässerung aufgestaut. Lizens:http://creativecommons.org/licenses/by-nc/2.0/ Link: http://www.flickr.com/photos/sandip_sengupta/3364405533/ +++CC/Sandip Sengupta+++ aufgenommen am 30.09.2008 geladen am 14.06.2011Bildunterschrift:

वैज्ञानिक कहते हैं कि घनत्व के अंतर की वजह से ही भारतीय प्लेट अपने आप में धंस रही है. धंसने की वजह से बची खाली जगह में प्लेट आगे बढ़ जाती है. इस प्रक्रिया के दौरान जमीन के भीतर तनाव पैदा होता है और भूकंप आते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक हर बार तनाव उत्पन्न होने से भूकंप पैदा नहीं होता है. तनाव कई अन्य कारकों के जरिए शांत होता है.

भूकंप के खतरे के लिहाज से भारत को चार भांगों में बांटा गया है। उत्तराखंड, कश्मीर का श्रीनगर वाला इलाका, हिमाचल प्रदेश व बिहार का कुछ हिस्सा, गुजरात का कच्छ और पूर्वोत्तर के छह राज्य अतिसंवेदनशील हैं. इन्हें जोन पांच में रखा गया है. जोन पांच का मतलब है कि इन इलाकों में ताकतवर भूकंप आने की ज्यादा संभावना बनी रहती है. 1934 से अब तक हिमालयी श्रेत्र में पांच बड़े भूकंप आ चुके हैं.


रिपोर्ट: एजेंसियां/ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: महेश झा

Thursday, July 14, 2011

नैनादेवी के नाम पर पडा नैनिताल


नैनादेवी के नाम पर पडा नैनिताल। बैरन नामक एक अग्रेज ने इस हील स्टेशन कि खोज कि, वो इतना आकर्षित हुआ कि १८४१ में नैनीताल शहर का निर्माण शुरू हो गया। सबसे पहले बैरन ने अपने लिए एक कोठी बनायी। इसके बाद कुमांऊ के तत्कालीन कमिश्नर लाशिंगटन ने १८४१ में अपने लिए एक कोठी का निर्माण करवाया। नैनीताल तीन ओर पहाड़ों से घिरा है, बीच में झील है। इसका अर्थ है नैनी झील के चारो और शहर बसा है। पुरा नैनिताल वन पहाड़ियों से घिरा हुआ है। १८६७ में शेर का डांडा और १९ सितंबर १८८० को विक्टोरिया होटल के पास भीषण भूस्खलन हुआ। इसमें १५१ लोग मारे गए। मरने वालों में ४३ विदेशी नागरिक भी थे।


रामप्यारी के ब्लोग मे जो क्लु दिया गया है वह हॉकि का मैदान है (नैनिताल)। ठिक उसके पिछे सुन्दर मस्जिद है। इस मैदान मे राम प्यारी के ब्लोग मे LIC OF INDIA का विज्ञापन दिखाई पड रहा है वो अब हटा दिया गया है अब STATE BANK OF INDIA का विज्ञापन ट्न्गा हुआ है। नैनीताल उत्तर प्रदेश के तत्कालीन ग्रीष्मकालीन राजधानी है। प्रर्यटक साफ सफाई का ध्यान नही देने कि वजह से गन्दगी भी दिख जाती है। आबादी बढने के कारण पहाडियो एवम पेडो कि कटाई ने नैनिताल के रुप को नुकशान पहुचा है। अब वो दिन दुर नही जब इन्ह हिल स्टेशनो मे पखे लग जाऐ। कृपया प्रकृति को बचाओ ताकि हमारी भावी पीढी भी इन्ह खुबसुरत वादियो के नजारे को देख सके।
प्रकृति के साथ हम खिलवाड करेगे तो प्रकृति हमे माफ नही करेगी। हम सभी को इसका खामियाजा भुगतना पडेगा।

-- Bisht G

"माधो सिंह "काळू" भंडारी"


"माधो सिंह "काळू" भंडारी"

आमू का बागवान मलेथा, लसण प्याज की क्यारी,
कूल बणैक अमर ह्वैगि, वीर माधो सिंह भंडारी.

बुबाजी भड़ सोंणबाण "काळू" भंडारी, ब्वै थै देवी भाग्यवान,
कथ्गा प्यारु तेरु मलेथा, माधो जख केळौं का बगवान.

दगड़्या थौ चम्पु हुड्क्या, देवी जनि उदिना थै कुटमदारी,
नौनु प्यारु गजे सिंह, जू छेंडा मूं कूल का खातिर मारी.

बांजा पुंगड़ौं अन्न निहोन्दु, पेण कु निथौ बल पाणी,
उदिना बोदि माधो जी कू, मेरा मलेथा ल्य्हवा पाणी.

दिनभर निर्पाणि का पुंगड़ौं, करदा छौं हम धाण,
भात खाण की टरकणी छन, मेरी बात लेवा माण.

मलेथा की की तीस बुझौलु, ल्ह्योलु अपणा मलेथा मां पाणी,
निहोंणु ऊदास प्यारी ऊदिना, दूर होलि हमारा गौं की गाणी.

चंद्रभागा गाड बिटि कूल बणायी, कोरी मलेथा मूं छेंडू,
पाणी छेंडा पार नि पौंछि, माधो सिंह चिंता मां नि सेंदु.

भगवती राजराजेश्वरी रात मां, माधो सिंह का सुपिना आई,
कूल कू पाणी पार ह्वै जालु, मन्खि की बलि देण का बाद बताई.

मलेथा की कूल का खातिर, माधो सिंह न करि गजे सिंह कू बलिदान,
गजे सिंह का दुःख मां रोन्दि बिब्लान्दि, ब्वै ऊदिना ह्वैगि बोळ्या का समान.

ऊदिना न तै दिन दुःख मां ख्वैक, दिनि थौ बल मलेथा मां श्राप,
ये वंश मां क्वी भड़ अब पैदा नि ह्वान, जौन गजे सिंह मारि करि पाप.***हिमांशु बिष्ट***

--
Bisht G

ऐतिहासिक पुरुष वीर माधो सिंह भंडारी

ऐतिहासिक पुरुष वीर माधो सिंह भंडारी का नाम गढ़वाल के घर घर में आज भी श्रृद्धा व सम्मान के साथ लिया जाता है. महाराजा महीपति शाह के शासनकाल में प्रधान सेनापति रहते हुए उन्होंने अनेक लड़ाईयां लड़ी व गढ़वाल की सीमा पश्चिम में सतलज तक बढाई. गढ़वाल राज्य की राजधानी तब श्रीनगर (गढ़वाल) थी और श्रीनगर के पश्चिम में लगभग पांच मील दूरी पर अलखनंदा नदी के दायें तट पर भंडारी का पैतृक गाँव मलेथा है. डाक्टर भक्तदर्शन के अनुसार "लगभग सन 1585 में जन्मे भंडारी सन 1635 में मात्र पचास वर्ष की आयु में छोटी चीन (वर्तमान हिमाचल)में वीरगति को प्राप्त हुए." उनके गाँव मलेथा में समतल भूमि प्रचुर थी किन्तु सिंचाई के साधन न होने के कारण मोटा अनाज उगाने के काम आती थी और अधिकांश भूमि बंजर ही पड़ी थी. भूमि के उत्तर में निरर्थक बह रही चंद्रभागा का पानी वे मलेथा लाना चाहते थे किन्तु बीच में एक बड़ी पहाड़ी बाधा थी. उन्होंने लगभग 225फीट लम्बी, तीन फिट ऊंची व तीन फिट चौड़ी सुरंग बनवाई किन्तु पानी नहर में चढ़ा ही नहीं. किवदंती है कि एक रात देवी ने स्वप्न में भंडारी को कहा कि यदि वह नरबली दे तो पानी सुरंग पार कर सकता है. किसी अन्य के प्रस्तुत न होने पर उन्होंने अपने युवा पुत्र गजे सिंह की बलि दी और पानी मलेथा में पहुँच सका. मृत्यु के बाद गजे सिंह की आत्मा का प्रलाप निम्न कविता में अभिव्यक्त है.
भंडारी द्वारा निर्मित सुरंग छाया: साभार गूगल
तुम तो वनराज की उपाधि पा चुके पिता
किन्तु मै तो मेमना ही साबित हुआ.
लोकगीतों के पंखों पर बिठा दिया
तुम्हे जनपद के लोगों ने,
इतिहास में अंकित हो गयी तुम्हारी शौर्यगाथा.
और मै मात्र- एक निरीह पशु सा,
एक आज्ञाकारी पुत्र मात्र- त्रेता के राम सा.
छोड़ा जिसने राजसी ठाठबाट,
समस्त वैभव और सभी सुख.
और मैंने,
आहुति दे डाली जीवन की तुम्हारी इच्छा पर.
मलेथा में माधो सिंह भंडारी स्मारक छाया: साभार गूगल
क्या राम की भांति
मेरा भी समग्र मूल्यांकन हो पायेगा?

ऐसी भी क्या विवशता थी पिता,
ऐसी भी क्या शीघ्रता थी
मै राणीहाट से लौटा भी नहीं था कि
तुमने कर दिया मेरे जीवन का निर्णय.
सोचा नहीं तुमने कैसे सह पायेगी
यह मर्मान्तक पीड़ा, यह दुःख
मेरी जननी, सद्ध्य ब्याहता पत्नी
और दुलारी बहना.
क्या कांपी नहीं होगी तुम्हारी रूह,
काँपे नहीं तुम्हारे हाथ
मेरी गरदन पर धारदार हथियार से वार करते हुए,
ओ पिता,
मै तो एक आज्ञाकारी पुत्र का धर्म निभा रहा था
किन्तु तुम, क्या वास्तव में मलेथा का विकास चाहते थे
या तुम्हे चाह थी मात्र जनपद के नायक बनने की ?

और यदि यह सच है तो पिता मै भी शाप देता हूँ कि
जिस भूमि के लिए मुझे मिटा दिया गया- उस भूमि पर
अन्न खूब उगे, फसलें लहलहाए किन्तु रसहीन, स्वाद हीन !
और पिता तुम, तुम्हारी शौर्यगाथाओं के साथ-
पुत्रहन्ता का यह कलंक तुम्हारे सिर, तुम्हारी छवि धूमिल करे !

Tuesday, March 15, 2011

बुरा ना मानो होली है

प्रेम राग से हरी भरी , रंगों की अठखेली है , आओ रंग लगाये सबको , बुरा ना मानो होली है बच्चो की टोली , रंग रंगीली , लहर लहर लहराती , हाथो में पिचकारी ले , सबको रंग लगाती , गुब्बारों में पानी भरकर, लोगों को वो डराती , खुलकर जी लें फिर से सब कुछ , प्रेमानंद की डोली है , आओ रंग लगाये सबको , बुरा ना मानो होली है मोह्हले के चौराहों से , फाग गीत जब गाते , नगाड़ों की धमक धमक से , बैर द्वेष मिट जाते , एक सूत्र में पिरोती सबको , गजब निराली बोली है , आओ रंग लगाये सबको , बुरा ना मानो होली है गुजिया का वो मधुर स्वाद , तरह तरह के भोग पकवान , आते हैं अब बड़े याद, वो सब तो यंहा नहीं , बस वही भांग की गोली है , आओ रंग लगाये सबको , बुरा ना मनो होली है रंग नहीं चढ़ते जन पे, पुच धर्म और जाती , ठंडी ठंडी ठंडाइ सबको ठंडक पहुंचाती , क्यों हम व्यर्थ उलझे फिर , संकीर्ण विचारों की झोली में , प्रेम रंग में रंग दे सबको , इस फागुन की होली में

Thursday, March 10, 2011

उत्तरांचल के अंदर एक उत्तराखंड हमेशा जिन्दा था

उत्तरांचल के अंदर एक उत्तराखंड हमेशा जिन्दा था। इसलिए कि राज्य बनाने के संघर्ष की प्राणशक्ति यही था और क्षेत्र की जनता ने लंबा आंदोलन इसी ऐतिहासिक नाम पर लड़ा था। ऐसे में राज्य को उसकी ऐतिहासिक पहचान से महरूम रखने का फैसला न सिर्फ अस्वाभाविक था, बल्कि एक मायने में जनता और आंदोलनकारियों की तौहीन भी हुई थी। नौ नवंबर 2000 को राज्य की स्थापना के बाद से ही उत्तराखंड नाम की वापसी की मांग जनता के अजेंडे में शामिल हो चुकी थी। आज यह नाम लौटाकर कांग्रेस सरकार ने अपने पुराने वादे को पूरा किया है।

भारतीय जनता पार्टी ने संसद में बहस के दौरान सरकार के इस कदम का यह कहकर विरोध किया कि इससे चुनावी राजनीति की बू आ रही है, क्योंकि उत्तरांचल में चुनाव निकट हैं। पार्टी ने यह भी कहा कि नाम बदलने से सरकारी मशीनरी को चार से पांच सौ करोड़ रुपये का फालतू बोझ वहन करना पड़ेगा। विरोध की ये दलीलें एक हद तक तो तर्कसंगत कही जा सकती हैं, पर ये पार्टी के पुराने निर्णय की अप्रासंगिकता से ध्यान बंटाने की कवायद ही है, क्योंकि तब उत्तरांचल नाम गढ़कर बीजेपी ने अलग राज्य के लिए आंदोलन चलाने वाली राजनीतिक ताकतों के हाथ से कमान और श्रेय छीनने की कोशिश की थी।

चुनावी राजनीति के बहाने से ही सही, परंतु आज यदि केंद्र सरकार की पहल पर संसद ने राज्य को उसका मूल नाम लौटाया है, तो कहना चाहिए कि यह तरक्की और प्रगति के लिए छेडे़ गए संघर्षों के भीतर की संवेदना को मान्यता देने की एक सार्थक कोशिश है। हालांकि ऐसा नहीं है कि उत्तरांचल नाम के रहते सब कुछ ठीक नहीं था और मूल नाम कोई जादू की छड़ी साबित होने जा रहा है। देखा जाए तो नए राज्य के रूप में उत्तरांचल की गिनती देश के बेहतर राज्यों में होने लगी है। आज राज्य यह दावा करने की स्थिति में है कि उसकी विकास दर 16.97 प्रतिशत का आंकड़ा छू रही है। करीब 10,000 करोड़ का निजी निवेश राज्य की बेहतर सेहत का संकेत है। राज्य निर्माण से पहले, यानी 1993-2000 में औद्योगिक विकास की जो दर यहां 1.9 फीसदी थी, वह आज 18.18 तक उछाल मार चुकी है। देश के बड़े-बड़े उद्योग यहां अपनी यूनिटें लगा रहे हैं। राज्य के ढांचागत विकास के असर कुछ बरसों में नजर आने लगेंगे। अलबत्ता सरकार पर फिजूलखर्ची, भ्रष्टाचार और बेलगाम नौकरशाही के अलावा ये भी आरोप लगते रहे हैं कि योजनाओं के लाभ सुदूर पर्वतीय इलाकों तक नहीं पहुंचे हैं और विकास की बयार का आनंद कुछ चुनिंदा क्षेत्रों और लोगों के बीच बह रही है।

कहा जा सकता है कि नाम में क्या धरा है, असल बात तो काम की है। लेकिन जनता की संवेदनाओं और भावनाओं की भी अहमियत होती है। इसीलिए मुम्बई, चेन्नै और बंगलुरु को उनके मूल नाम वापस लौटाए गए। फिर यह भी पूछा जाना चाहिए कि छत्तीसगढ़ और झारखंड के मामले में आंचलिकता के जो आग्रह स्वीकार किए गए, उत्तराखंड में उन्हें परे क्यों फेंक दिया गया। कहीं यही वजह तो नहीं कि लंबे संघर्ष और कुर्बानी के बाद हासिल अलग राज्य के प्रति जो जज्बाती सोच मुनस्यारी और धारचूला से लेकर माणा और हरसिल तक झलकनी चाहिए थी, वह नदारद है?

दरअसल हमारे पास यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि जन आकांक्षाओं के खिलाफ उत्तरांचल नाम देकर बीजेपी इस नए राज्य के इतिहास पर हमेशा के लिए अपनी धाक के चिह्न छोड़ देना चाहती थी। भले ही तर्क यह दिया गया कि 1960 में उत्तराखंड मंडल नाम सिर्फ तीन जिलों चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के लिए दिया गया था, जो कि चीन से लगी सीमा पर सैनिक हलचल के कारण बनाए गए थे। बाकी के जिले अंग्रेजों के शासनकाल से चली आ रही कुमायूं कमिश्नरी के तहत ही रखे गए। यह स्थिति 1969 तक रही और तब गढ़वाल मंडल और कुमायूं मंडल अपने पृथक स्वरूप में अस्तित्व में आए। यूपी विधानसभा में पारित भूमि प्रबंधन और बंदोबस्त विधेयक, कुमायूं एवं उत्तराखंड जमींदारी अंत अधिनियम-1960 और उत्तराखंड एवं कुमायूं भू-राजस्व बंदोबस्त नियमावली-1960 इस बात के उदाहरण हैं कि उत्तराखंड शब्द मुख्य रूप से गढ़वाल मंडल के लिए ध्वनित होता रहा है। इस तरह उत्तराखंड के उत्तरा और कुमायूं यानी कूर्मांचल से अंचल शब्द को शामिल करते हुए उत्तरांचल का निर्माण किया गया। बीजेपी के नेता इस दावे को भी गलत मानते हैं कि उत्तराखंड पौराणिक शब्द है। स्कंद पुराण में गढ़वाल क्षेत्र को केदारखंड और कुमायूं को मानस खंड कहा गया है। तार्किक आधार पर देखें तो उत्तरांचल नाम की ईजाद के पीछे बीजेपी की यह सिद्धांत गलत भी नहीं लगता, लेकिन लोगों में नाराजगी इस बात को लेकर रही कि गहरी छानबीन से आंचलिकता की यह थ्योरी पेश कर बीजेपी ने उत्तरांचल तो ढूंढ निकाला, पर राजधानी और पहले मुख्यमंत्री के सवाल पर आंचलिकता का यह आग्रह इकतरफा फैसलों का शिकार कैसे हो गया?

उत्तरांचल नाम बीजेपी ने 1980 के दशक के उत्तरार्ध में दिया। इसके पीछे उत्तराखंड के मुद्दे पर आंदोलन चला रहे दलों, खासकर उत्तराखंड क्रांति दल के समानांतर अपना आंदोलन चलाना था। 1994 के आते-आते पार्टी ने इस दिशा में काफी सफलता भी हासिल कर ली और वह नए राज्य का नाम उत्तरांचल रखने में सफल भी हुई, पर इसे आम लोगों के बीच स्वीकार्य बनाने में उसे सफलता नहीं मिल पाई। इसके संकेत 9 नवंबर 2000 की रात देहरादून में देश के इस 27वें राज्य के स्थापना समारोह में सरकार विरोधी नारों के रूप में साफ देखे जा सकते थे। छह वर्षों का मौजूदा अंतराल छोड़ दें तो अविभाजित यूपी के जमाने से चले आ रहे शासकीय दस्तावेजों में इस पर्वतीय भूभाग के लिए उत्तराखंड शब्द का ही उपयोग होता रहा है।

यूपी के पहाड़ी इलाकों में नए राज्य की मांग उठी ही इसलिए थी कि यहां की खास स्थितियां अलग प्रशासनिक इकाई की मांग करती थीं। यानी क्षेत्रीय विकास, आत्मनिर्भरता और बराबरी के आग्रह इस राज्य की रचना के मूल में हैं और 'उत्तराखंड' शब्द उसका प्रतीक है। यह नाम सिर्फ अपनी बुनियाद से ही नहीं जोड़ता, भविष्य के लिए जागरूक भी बनाता है। हालांकि विकास की समस्याओं का हल सिर्फ नाम बदलने से नहीं हो जाता, लेकिन राज्य के प्रति आस्था और वजूद से जुड़े संघर्ष की यह एक बड़ी जीत तो है ही।