Saturday, September 19, 2009

माँ भगवती (नवरात्रा)


नवरात्रा के प्रथम तीन दिन


प्रथम शैलपुत्री
माँ भगवती की मूर्ति नौ रूपों में है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इनके पृथक-पृथक नाम संसार में प्रचलित हैं, जिनका उल्लेख पुराणों में मिलता है तथा विभिन्न रूपों का चमत्कार विभिन्न प्रकार से अनन्य भक्तों द्वारा अनुभूत किया जाता है। इन रूपों में से प्रथम रूप शैल-पुत्री के नाम से जाना जाता है। गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती देवी को ही शैलपुत्री कहा गया है। हिमालय की तपस्या व प्रार्थना से भगवती ने हिमालय के यहां पुत्री रूप में जन्म लिया था जिस कारण शैलपुत्री कहा जाता है।

द्वितीय ब्रम्हाचारिणी
माँ भगवती का द्वितीय रूप ब्रम्हाचारिणी उपनिषदों में कहा गया है। "चाररियितुं शील यस्या: सा ब्रम्हाचारिणी" सच्चिदानन्दमय ब्रम्हा की प्राप्ति करना चाहता है, जिन्हें ब्रम्हा (ईश्वर) की प्राप्ति करना है, वे भगवती के ब्रम्हाचारिणी स्वरूप का घ्यान करके साधना करें, निश्चित रूप से भगवती कृपा से ब्रम्हा मुहूर्त में भगवती के इस स्वरूप का घ्यान करें, पूजा अर्चना के पश्चात निम्नलिखित मंत्र का जप करें।
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्ति प्रदायिनी।
त्वां स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तय:।।
ब्रम्हा की प्राप्ति तो होगी और उसके साथ में भक्त की इच्छाओं की भी पूर्ति होती है। पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और संयम से की गई साधना निश्चित रूप से फलीभूत होती है।

तृतीय चन्द्रघण्टा
माँ भगवती का तृतीय रूप चन्द्रघण्टा देवी के रूप में है। "चन्द्र: घण्टायास्या: सा" आहलादकारी चन्द्रमा जिनकी घण्टा में स्थित हो उन देवी का नाम चन्द्रघण्टा है।
साधक भगवती के इस रूप का घ्यान कारता है तो वह समृद्धि, भौतिक सम्पन्नता तथा संसार के समस्त भौतिक सुख प्राप्त करता है। पूजन व घ्यान का समय सूर्योदय से पूर्व का है जो भक्त नवरात्रा में 4 वर्ष की सुन्दर निरोगी कन्या का पूजन करता है उसे शीघ्र फल की प्राप्ति होती है। इस साधना के लिये निम्न मंत्र है-
क, ए, ई, ल, ह्नीं, ह, स, क, ह, ल, ह्नीं, स, क, ल, ह्नीं
माँ चन्द्रघण्टा का पन्द्रह अक्षर का मंत्र है, जो भी भक्त नवरात्रा के प्रथम दिन से नवमी तक पूर्ण विधि-विधान से करता है उसकी सभी प्रकार की मनोकामनायें पूर्ण हो जाती है। इस विधान में प्रतिदिन चार वर्ष की आयु सुन्दर व निरोगी कन्या का पूजन करना अनिवार्य है।

Tuesday, September 15, 2009

uttranchal song (उत्तरांचल गीत)


बसंत वर्णन

दैणा होई जाया बै सेळी धरती
दैणा होई जाया बै भूमीयाळा द्यौऊ
दैणा होई जाया बै माईऽऽमडूली
दैणा होई जाया बै रितू बसंता

दैणा होयां देबताओ उलामुला मासा
दैणा होयां देबताओ चुलामुला बारा
ऋतु बौड़ी अँग्या बै दाई जसो फेरो
ऋतु बौड़ी अँग्या बै बारूणी बगत

उलापैटा मासा बै बौड़ी कै नी औना
रितु फेरी बसंता बै फेर बौड़ी अँगे
सूकुअँ का सानणा मौली कै नी औना
हरीं भरीं सानणा बै फेर मौळी अँगे

कनु अँगे द्यब्ताओ चौपंथी चौखाळ
मौळणऊ लैगै बै चांचर की धूप
रितु चड़ो बासना रितु रितु बोना
रितु चड़ी बासनी मैता-मैता बोनी

अखोड़ा की फाग्यंू मा कफूवा बासलो
सांयो-सांयो बासा बै घूघूती घूरली
सेळा जैंता बारा बै सेळी सूरी बासा
माळनों की घूघूती पराबतूं अँगे

बारा चड़ी बासनी बार फूली जान
फूलणा लैगई बाटानों फ्यूंलड़ी
कनि फूली द्यब्ताओ जया-बिजया
यनी हूनी द्यब्ताओ वो रितु बसंता

याबा लैगई वो हरियां भादोओ
कनु अँगी द्यब्ताओ तरूणी असोज
फूलणाऊ बैठीग्या कुंकूंणी बांसुळी
फूलणाऊ बैठीग्या जया-विजया

फूलणाऊ बैठीग्या स्यैता सिरीताज
फूलणाऊ बैठीग्या रातूनों की लता
फूलणाऊ बैठीग्या सुर्जना का कौळ
फूलणाऊ बैठीग्या राई-बुराई

फूलणाऊ बैठीग्या स्यैता कंऊळे
फूलणाऊ बैठीग्या कौंला फ्योंणा कौंळा
फूलणाऊ बैठीग्या कौळा ब्रमी कौंळा
यनी हूनी द्यब्ताओ रितु बसंता
यनी हूना द्यब्ताओ उलामुला मासा

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Bisht G
bishtb50@gmail.com

Sunday, September 13, 2009

''गड्वाली गीत''


बीच का रोपदारियों छांटो रोप्या सेरो, बासमती घणी रोप्यां ।
तोय मूंग ब्वारी के जाणी न बोल्या, बासमती घणी रोप्यां ।
स्वामी देनी बासूंड्या रैबार, बासमती घणी रोप्यां ।
भैंस के भ्याणी चन्दोला बिन्दोला, बसो राणी छानी आयां ।
तोय मूंग ब्वारी के जाणी न बोल्या, बसो राणी छानी आयां ।
स्वामी देनी बासूंड्या रैबार, बसो राणी छानी आयां ।
पींडों ले लाया नौ दोण नौ पाथा, बसो राणी छानी आयां ।
तोय मूंग ब्वारी के जाणी न बोल्या, बसो राणी छानी आयां ।
स्वामी देनी बासूंड्या रैबार, बसो राणी छानी आयां ।
गौड़ी ले भ्याणी सूरजू कौरों की, बसो राणी छानी आयां ।
तोय मूंग ब्वारी के जाणी न बोल्या, बसो राणी छानी आयां ।
पींडों ले लाया नौ दोण नौ पाथा, बसो राणी छानी आया ।
स्वामी न देनू बासूंड्या रैबार, बसो राणी छानी आयां ।

Sunday, August 30, 2009

देवभूमि गढ़वाल जहाँ अनेक सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण उल्लेखनीय है


देवभूमि गढ़वाल जहाँ अनेक सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण उल्लेखनीय है वहीं पर पुष्पप्रियता यहाँ की अन्यतम विशेषता है। रंग-बिरंगे लुभावने पुष्पों के प्रति सांस्कारिक अनुरक्ति का भाव-निर्झर यहाँ गीतों एवं नृत्य-गीतों के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

गढ़वाल-सौंदर्य, प्रणय और जीवंतता की क्रीड़ाभूमि है। प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ यहाँ का मानवीय सौंदर्य भी उच्च एवं प्रभावी कोटि का है। गढ़वाली गीतों व नृत्य-गीतों में मानवीय रूप-सौंदर्य तथा या रमणीक प्राकृतिक ऐश्वर्य बिखरा हुआ है। जैसा इस झुमैलो नामक नृत्य-गीत में वर्णित है कि एक ओर लयेड़ी, लया सरसों, राडौड़ी या राड़ा पुष्प विकसित हो गए हैं, दूसरी ओर बुरांस अपनी अरुणिमा आभा में वन-वृक्षों को डोलियों की भाँति सजाने लगा है-
फूलीक ऐ मैंने झमैलो लयेड़ी राडोड़ी झुमैलो
नीं गंधा बुरांस झुमैलो डोला सी गच्छैने झुमैलो

हिमालय हिम की शीतल पवन और वन के वृक्षों के आडू, घिंघारू, बांज, बुरांस, साकिना इत्यादि वृक्षों में पुष्पोद्भव देखकर मनरूपी मयूर का नृत्य हेतु विवश होना स्वाभाविक ही है। जैसा इस मयूर नृत्य-गीत से स्पष्ट है-
हैंयुचलि डांड्यूं की चली हिवांली कांकोरा
रंगम तुब्हे, नाचण लगे मेरा मन कू मोर
आरू, घिंगारू, बांज, बुरांस
साकिनी झका झोर

बसंत उमंग, उल्लास व हास्य का पर्व है। इस रमणीय काल में गढ़वाल की प्राकृतिक सुषमा का अपना महत्व है। इसके आगमन से वन-वृक्षों की कमनीयता तथा कुसुमों का मनोमुग्धकारी सौंदर्य मुखरित हो जाता है। पुष्पोद्भव के इस रम्य अवसर पर सभी ह्रदयों में चेतना, स्फूर्ति एवं उल्लास का स्वतः संचरण हो जाता है। इस समय न केवल मानव अपितु प्रकृति का रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठता है-
हँसदो बसंत ऐगी गिंवाड़ी सारी
पिंगली फ्योंलड़ी नाचे घागरी पसारी

गढ़वाल में रमणीक बसंत ऋतु की सूचना यहाँ के ग्वीराल, मालू, फ्योंली, साकिनी, कूंजू, तुषरी व बुरांस इत्यादि मनोहर पुष्पराजियों से मिलती है।
गढ़-साहित्य एवं गीतों में वासंतिक वैभव, वनश्री व उसके मंजुल कुसुमों का रूप-चित्र यत्र-तत्र बिखरा हुआ है। बसंत-श्री में अभिवृद्धि करनेवाले लयेड़ी (लया या सरसों) तथा जयेड़ी (जौ) का उल्लेख इस लोकगीत में किया गया है- 'ऋतु बसंत माँ फुली लयेड़ी जौवन जोर जताली जयेड़ी' यही नहीं पुष्पोत्सव के इस रम्यकाल में जब कानन-कानन बुरांस की अरुणिमा से और डाली-डाली हिलांस पक्षी के गीतों से गूँजने लगे तब हिमालय क्षेत्र के गाँव और अधिक प्रिय लगने लगते हैं-
मेरो गाँव भलो प्यारो, डांडू फूली बुरांसी, बासदौं हिंलासी

वास्तव में बांज, बुरांस व कुलैं (चीड़) के सघन वन ही गढ़वाल का सौंदर्य है। चैत्र में चित्ताकर्षक बुरांस से वन्य शोभा और भी दर्शनीय हो जाती है-
गदन्यों मां पांणी सेरों मा छ कूल, खिल-खिल हंसदू बुरांस कु फूल
गढ़वाल के पक्षियों में घूघती को मयालू या अत्यंत मायादार कहें तो अनुचित न होगा।
पर्वत पुत्रियाँ अपने ह्रदय की बात इसी से कहना उचित मानती हैं। प्रकृति के स्वच्छंद वातावरण तथा रंग-बिरंगे पुष्पों के बीच वे अपने समस्त दुःखों को विस्मृत कर घुघती नृत्य-गीत गाती हैं। वे कहती हैं- 'देखो धरती के गले में पुष्पहार सज गया है तथा पयाँ, धौलू, फ्यूंली, आरू, लया व बुरांस पुष्प विकसित हो गए हैं-
फूलों की हंसुली
पयां, धौलू, फ्यूंली, आरू
लया, फूले बुरांस

फुलारी महीनों के आते ही मायके के लिए व्यथित गढ़-रमणियाँ अपनी आत्मिक क्षुधा की अभिव्यक्ति जिन नृत्यों के माध्यम से करती हैं उन्हें खुदेड़ नृत्य-गीत संज्ञा प्रदान की गई है। खुंदेड नृत्य-गीतों के विषय - अपना घर, गाँव, वन, वृक्ष, पशु-पक्षी, हरीतिमा, निर्झर, नदी एवं प्रसून होते हैं। यहाँ पर खुदेड़ नृत्य गीत के माध्यम से कांस तथा बुरांस प्रसून के साथ-साथ मेल्वड़ी पक्षी की सुमधुर गीत ध्वनि का स्मरण किया गया है-
फूली जालो कांस वबै, फूली जालो कांस वूबै
मेल्वडी बांसली वबै, फूली गै बुरांस

हिमालय के कवियों ने नायक एवं नायिका के रूप-सौंदर्य वर्णन हेतु जिन पुष्प गीतों का सृजन किया है उनमें बुरांस तथा फ्योंली प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त इन विद्वान कवियों ने पोस्त, कूंजू, गुलाब, कमल प्रसूनों को अपनी गीतमाला में पिरो-पिरोकर रूप सौंदर्य का सुंदर एवं स्वाभाविक चित्रण किया है। कहीं पर गीतकार नायिका को रक्ताभ बुरांस की भाँति कमनीय तथा आकर्षक कहता है और कहीं उसे फ्योंली की तरह सुंदर, सजीली राजकन्या कहता है- बुरांस जनो फूल, फ्योंली जनी रौतेली

एक स्थल पर गीतकार नव-यौवना की कोमल काया से प्रभावित होकर उसे फ्योंली की कली कह बैठता है- ''फ्यूंली की-सी कली।'' अन्यत्र सुई नृत्य-गीत के माध्यम से कवि 'गालू मां बुरांस।' यानी पहाड़ी रमणी के श्वेत कपोलों पर रक्तवर्ण बुरांस का आरोपण कर अपनी शृंगार प्रसाधन विशेषज्ञता का सुंदर परिचय प्रस्तुत करता है। इनके अतिरिक्त गढ़वाली गीत सृजकों ने 'पोस्तू का छुमा, त्वेसरी गुलाबी फूल मेरी भग्यानी बौ।' इत्यादि नृत्य-गीतों के द्वारा उन्होंने पोस्त तथा गुलाब प्रसूनों से नायिका के रूप-सौंदर्य की वर्णन किया है

नायिका सौंदर्य चित्रण ही गढ़ कवियों का एकमात्र उद्देश्य रहा हो, ऐसा नहीं अपितु इन्होंने नायक सौंदर्य वर्णन हेतु भी पुष्प गीतों की सृष्टि....
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Bisht G

Wednesday, August 26, 2009

अब तो यादों में बस गया "पहाड़ पर बचपन"

अब तो यादों में बस गया है,
पहाड़ पर बिताया, प्यारा बचपन,
सोचणु छौं, कनुकै बतौँ, आज, अतीत मां ख्वैक,
कनु थौ अपणु बचपन.

दादी, खाणौं खलौन्दि वक्त, बोल्दि थै,
एक टेंड खाणौं कू नि खत्यन,
नितर तुमारा आंख फूटला, रुसाड़ा का भीतर,
चूल्ला तक जाण की, इजाजत कतै नि थै,
संस्कार माणा, या अनुशासन समझा.

स्कूल दूर थौ, अर् ऊकाळि कू बाटु,
बगल मां पाटी, हाथ मां बोद्ग्या,
जै फर घोळिक रखदा था,
कमेड़ा की माटी.

चैत का मैना ल्ह्योंदा था,
अर् देळ्यौं मां चढ़ौन्दा था,
सुबेर काळी राति,पिंगळा फ्यौंलि का फूल,
कौदे की कर करी रोठ्ठी खैक,
फ़िर जांदा था स्कूल.

अपणा सगोड़ा की, मांगिक या चोरिक,
छकि छकिक खांदा था, काखड़ी, मुंगरी, आम, आरू,
बण फुंड हिंसर, किन्गोड़, करौंदु,
खैणा, तिमला, घिंगारू.

कौथिग जांदा था, बैसाख का उलार्या मैना,
झीलु सुलार अर् कुरता पैरिक,
देखदा था खुदेड़, अफुमां रोन्दि,
बेटी-ब्वारी, चाची, बोडी, कै जोड़ी ढोल-दमौं,
बगछट ह्वैक नाचदा बैख, गोळ घूम्दी चर्खी,
चूड़ी, झुमकी,माळा की दुकान,
हाथु मां चूड़ी पैरदी, बेटी -ब्वारी, चाची, बोडी,
ज्वान शर्मान्दि नौनि हेरदा लोग,
जैन्कि मांगण की बात चनि छ,
स्वाळि,पकोड़ी,खांदा लोग, आलु पकोड़ी,


जलेबी की दुकान, अहा!


कथ्गा खुश होन्दा था, बचपन मां


हेरि-हेरिक.
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Bisht G

Monday, August 24, 2009

रंगीली चंगीली पुतई कैसी, फुल फटंगां जून जैसी, काकड़े फुल्युड़ कैसी ओ मेरी किसाणा

रंगीली चंगीली पुतई कैसी, फुल फटंगां जून जैसी, काकड़े फुल्युड़ कैसी ओ मेरी किसाणा
उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमको घामा, उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमको घामा
रंगीली चंगीली पुतई कैसी, फुल फटंगां जून जैसी, काकड़े फुल्युड़ जैसी ओ मेरी किसाणा
उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमको घामा, उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमको घामा

गोरू बाछा अड़ाट लैगो भुखै गोठ पाना, गोरू बाछा अड़ाट लैगो भुखै गोठ पाना
तेरि नीना बज्यूण हैगे, उठ वे चमाचम, तेरि नीना बज्यूण हैगे, उठ वे चमाचम
घस्यारूं दातुली खणकि, घस्यारू दातुली खणकि, वार पार का डाना,
उठ मेरी नांरिंगे दाणी, उठ वे चमाचम, उठ मेरी नांरिंगे दाणी, उठ वे चमाचम

उठ भागी नाखर ना कर, पली खेड़ खाताड़ा, उठ भागी नाखर ना कर, पली खेड़ खाताड़ा
ले पिले चहा गिलास गरमा गरम, ले पिले चहा गिलास गरमा गरम
उठे मेरी पुन्यू की जूना, उठे मेरी पुन्यू की जूना, छोड़ वे घुर घूरा
ले पिले चहा घुटुकी, गुड़ को कटका, ले पिले चहा घुटुकी, गुड़ को कटका

रंगीली चंगीली पुतई कैसी, फुल फटंगां जून जैसी, काकड़े फुल्युड़ कैसी ओ मेरी किसाणा
उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमैगो घामा



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Bisht G

"माँ की आँखों मैं आंसू"

"माँ की आँखों मैं आंसू"

उत्तराखंड के एक गोँव में,अकेली माँ,
इन्तजार में है अपने बेटे की,
क्योंकि जिसे उसने,बचपन में पाल पोसकर,
पढाया लिखाया,कामयाबी की राह में,
आगे बढाया,लेकिन एक दिन,
जवान होने पर,वह उसकी आँखों से,
दूर चला गया,रोजगार की तलाश में.!!!

कैसी कसक है उसके मन में,
जिसे उसने बुढापा का सहारा समझा,
आज दूर है उससे,लेकिन.
कासिस उसके मन में भी है,
माँ से दूर होने की.

वक्त निकालकर जब वह जाता है गाँव,
तो माँ से मिलने पर छलक जाते हैं,
''माँ की आँखों में आंसू''