Thursday, July 14, 2011

ऐतिहासिक पुरुष वीर माधो सिंह भंडारी

ऐतिहासिक पुरुष वीर माधो सिंह भंडारी का नाम गढ़वाल के घर घर में आज भी श्रृद्धा व सम्मान के साथ लिया जाता है. महाराजा महीपति शाह के शासनकाल में प्रधान सेनापति रहते हुए उन्होंने अनेक लड़ाईयां लड़ी व गढ़वाल की सीमा पश्चिम में सतलज तक बढाई. गढ़वाल राज्य की राजधानी तब श्रीनगर (गढ़वाल) थी और श्रीनगर के पश्चिम में लगभग पांच मील दूरी पर अलखनंदा नदी के दायें तट पर भंडारी का पैतृक गाँव मलेथा है. डाक्टर भक्तदर्शन के अनुसार "लगभग सन 1585 में जन्मे भंडारी सन 1635 में मात्र पचास वर्ष की आयु में छोटी चीन (वर्तमान हिमाचल)में वीरगति को प्राप्त हुए." उनके गाँव मलेथा में समतल भूमि प्रचुर थी किन्तु सिंचाई के साधन न होने के कारण मोटा अनाज उगाने के काम आती थी और अधिकांश भूमि बंजर ही पड़ी थी. भूमि के उत्तर में निरर्थक बह रही चंद्रभागा का पानी वे मलेथा लाना चाहते थे किन्तु बीच में एक बड़ी पहाड़ी बाधा थी. उन्होंने लगभग 225फीट लम्बी, तीन फिट ऊंची व तीन फिट चौड़ी सुरंग बनवाई किन्तु पानी नहर में चढ़ा ही नहीं. किवदंती है कि एक रात देवी ने स्वप्न में भंडारी को कहा कि यदि वह नरबली दे तो पानी सुरंग पार कर सकता है. किसी अन्य के प्रस्तुत न होने पर उन्होंने अपने युवा पुत्र गजे सिंह की बलि दी और पानी मलेथा में पहुँच सका. मृत्यु के बाद गजे सिंह की आत्मा का प्रलाप निम्न कविता में अभिव्यक्त है.
भंडारी द्वारा निर्मित सुरंग छाया: साभार गूगल
तुम तो वनराज की उपाधि पा चुके पिता
किन्तु मै तो मेमना ही साबित हुआ.
लोकगीतों के पंखों पर बिठा दिया
तुम्हे जनपद के लोगों ने,
इतिहास में अंकित हो गयी तुम्हारी शौर्यगाथा.
और मै मात्र- एक निरीह पशु सा,
एक आज्ञाकारी पुत्र मात्र- त्रेता के राम सा.
छोड़ा जिसने राजसी ठाठबाट,
समस्त वैभव और सभी सुख.
और मैंने,
आहुति दे डाली जीवन की तुम्हारी इच्छा पर.
मलेथा में माधो सिंह भंडारी स्मारक छाया: साभार गूगल
क्या राम की भांति
मेरा भी समग्र मूल्यांकन हो पायेगा?

ऐसी भी क्या विवशता थी पिता,
ऐसी भी क्या शीघ्रता थी
मै राणीहाट से लौटा भी नहीं था कि
तुमने कर दिया मेरे जीवन का निर्णय.
सोचा नहीं तुमने कैसे सह पायेगी
यह मर्मान्तक पीड़ा, यह दुःख
मेरी जननी, सद्ध्य ब्याहता पत्नी
और दुलारी बहना.
क्या कांपी नहीं होगी तुम्हारी रूह,
काँपे नहीं तुम्हारे हाथ
मेरी गरदन पर धारदार हथियार से वार करते हुए,
ओ पिता,
मै तो एक आज्ञाकारी पुत्र का धर्म निभा रहा था
किन्तु तुम, क्या वास्तव में मलेथा का विकास चाहते थे
या तुम्हे चाह थी मात्र जनपद के नायक बनने की ?

और यदि यह सच है तो पिता मै भी शाप देता हूँ कि
जिस भूमि के लिए मुझे मिटा दिया गया- उस भूमि पर
अन्न खूब उगे, फसलें लहलहाए किन्तु रसहीन, स्वाद हीन !
और पिता तुम, तुम्हारी शौर्यगाथाओं के साथ-
पुत्रहन्ता का यह कलंक तुम्हारे सिर, तुम्हारी छवि धूमिल करे !

Tuesday, March 15, 2011

बुरा ना मानो होली है

प्रेम राग से हरी भरी , रंगों की अठखेली है , आओ रंग लगाये सबको , बुरा ना मानो होली है बच्चो की टोली , रंग रंगीली , लहर लहर लहराती , हाथो में पिचकारी ले , सबको रंग लगाती , गुब्बारों में पानी भरकर, लोगों को वो डराती , खुलकर जी लें फिर से सब कुछ , प्रेमानंद की डोली है , आओ रंग लगाये सबको , बुरा ना मानो होली है मोह्हले के चौराहों से , फाग गीत जब गाते , नगाड़ों की धमक धमक से , बैर द्वेष मिट जाते , एक सूत्र में पिरोती सबको , गजब निराली बोली है , आओ रंग लगाये सबको , बुरा ना मानो होली है गुजिया का वो मधुर स्वाद , तरह तरह के भोग पकवान , आते हैं अब बड़े याद, वो सब तो यंहा नहीं , बस वही भांग की गोली है , आओ रंग लगाये सबको , बुरा ना मनो होली है रंग नहीं चढ़ते जन पे, पुच धर्म और जाती , ठंडी ठंडी ठंडाइ सबको ठंडक पहुंचाती , क्यों हम व्यर्थ उलझे फिर , संकीर्ण विचारों की झोली में , प्रेम रंग में रंग दे सबको , इस फागुन की होली में

Thursday, March 10, 2011

उत्तरांचल के अंदर एक उत्तराखंड हमेशा जिन्दा था

उत्तरांचल के अंदर एक उत्तराखंड हमेशा जिन्दा था। इसलिए कि राज्य बनाने के संघर्ष की प्राणशक्ति यही था और क्षेत्र की जनता ने लंबा आंदोलन इसी ऐतिहासिक नाम पर लड़ा था। ऐसे में राज्य को उसकी ऐतिहासिक पहचान से महरूम रखने का फैसला न सिर्फ अस्वाभाविक था, बल्कि एक मायने में जनता और आंदोलनकारियों की तौहीन भी हुई थी। नौ नवंबर 2000 को राज्य की स्थापना के बाद से ही उत्तराखंड नाम की वापसी की मांग जनता के अजेंडे में शामिल हो चुकी थी। आज यह नाम लौटाकर कांग्रेस सरकार ने अपने पुराने वादे को पूरा किया है।

भारतीय जनता पार्टी ने संसद में बहस के दौरान सरकार के इस कदम का यह कहकर विरोध किया कि इससे चुनावी राजनीति की बू आ रही है, क्योंकि उत्तरांचल में चुनाव निकट हैं। पार्टी ने यह भी कहा कि नाम बदलने से सरकारी मशीनरी को चार से पांच सौ करोड़ रुपये का फालतू बोझ वहन करना पड़ेगा। विरोध की ये दलीलें एक हद तक तो तर्कसंगत कही जा सकती हैं, पर ये पार्टी के पुराने निर्णय की अप्रासंगिकता से ध्यान बंटाने की कवायद ही है, क्योंकि तब उत्तरांचल नाम गढ़कर बीजेपी ने अलग राज्य के लिए आंदोलन चलाने वाली राजनीतिक ताकतों के हाथ से कमान और श्रेय छीनने की कोशिश की थी।

चुनावी राजनीति के बहाने से ही सही, परंतु आज यदि केंद्र सरकार की पहल पर संसद ने राज्य को उसका मूल नाम लौटाया है, तो कहना चाहिए कि यह तरक्की और प्रगति के लिए छेडे़ गए संघर्षों के भीतर की संवेदना को मान्यता देने की एक सार्थक कोशिश है। हालांकि ऐसा नहीं है कि उत्तरांचल नाम के रहते सब कुछ ठीक नहीं था और मूल नाम कोई जादू की छड़ी साबित होने जा रहा है। देखा जाए तो नए राज्य के रूप में उत्तरांचल की गिनती देश के बेहतर राज्यों में होने लगी है। आज राज्य यह दावा करने की स्थिति में है कि उसकी विकास दर 16.97 प्रतिशत का आंकड़ा छू रही है। करीब 10,000 करोड़ का निजी निवेश राज्य की बेहतर सेहत का संकेत है। राज्य निर्माण से पहले, यानी 1993-2000 में औद्योगिक विकास की जो दर यहां 1.9 फीसदी थी, वह आज 18.18 तक उछाल मार चुकी है। देश के बड़े-बड़े उद्योग यहां अपनी यूनिटें लगा रहे हैं। राज्य के ढांचागत विकास के असर कुछ बरसों में नजर आने लगेंगे। अलबत्ता सरकार पर फिजूलखर्ची, भ्रष्टाचार और बेलगाम नौकरशाही के अलावा ये भी आरोप लगते रहे हैं कि योजनाओं के लाभ सुदूर पर्वतीय इलाकों तक नहीं पहुंचे हैं और विकास की बयार का आनंद कुछ चुनिंदा क्षेत्रों और लोगों के बीच बह रही है।

कहा जा सकता है कि नाम में क्या धरा है, असल बात तो काम की है। लेकिन जनता की संवेदनाओं और भावनाओं की भी अहमियत होती है। इसीलिए मुम्बई, चेन्नै और बंगलुरु को उनके मूल नाम वापस लौटाए गए। फिर यह भी पूछा जाना चाहिए कि छत्तीसगढ़ और झारखंड के मामले में आंचलिकता के जो आग्रह स्वीकार किए गए, उत्तराखंड में उन्हें परे क्यों फेंक दिया गया। कहीं यही वजह तो नहीं कि लंबे संघर्ष और कुर्बानी के बाद हासिल अलग राज्य के प्रति जो जज्बाती सोच मुनस्यारी और धारचूला से लेकर माणा और हरसिल तक झलकनी चाहिए थी, वह नदारद है?

दरअसल हमारे पास यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि जन आकांक्षाओं के खिलाफ उत्तरांचल नाम देकर बीजेपी इस नए राज्य के इतिहास पर हमेशा के लिए अपनी धाक के चिह्न छोड़ देना चाहती थी। भले ही तर्क यह दिया गया कि 1960 में उत्तराखंड मंडल नाम सिर्फ तीन जिलों चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के लिए दिया गया था, जो कि चीन से लगी सीमा पर सैनिक हलचल के कारण बनाए गए थे। बाकी के जिले अंग्रेजों के शासनकाल से चली आ रही कुमायूं कमिश्नरी के तहत ही रखे गए। यह स्थिति 1969 तक रही और तब गढ़वाल मंडल और कुमायूं मंडल अपने पृथक स्वरूप में अस्तित्व में आए। यूपी विधानसभा में पारित भूमि प्रबंधन और बंदोबस्त विधेयक, कुमायूं एवं उत्तराखंड जमींदारी अंत अधिनियम-1960 और उत्तराखंड एवं कुमायूं भू-राजस्व बंदोबस्त नियमावली-1960 इस बात के उदाहरण हैं कि उत्तराखंड शब्द मुख्य रूप से गढ़वाल मंडल के लिए ध्वनित होता रहा है। इस तरह उत्तराखंड के उत्तरा और कुमायूं यानी कूर्मांचल से अंचल शब्द को शामिल करते हुए उत्तरांचल का निर्माण किया गया। बीजेपी के नेता इस दावे को भी गलत मानते हैं कि उत्तराखंड पौराणिक शब्द है। स्कंद पुराण में गढ़वाल क्षेत्र को केदारखंड और कुमायूं को मानस खंड कहा गया है। तार्किक आधार पर देखें तो उत्तरांचल नाम की ईजाद के पीछे बीजेपी की यह सिद्धांत गलत भी नहीं लगता, लेकिन लोगों में नाराजगी इस बात को लेकर रही कि गहरी छानबीन से आंचलिकता की यह थ्योरी पेश कर बीजेपी ने उत्तरांचल तो ढूंढ निकाला, पर राजधानी और पहले मुख्यमंत्री के सवाल पर आंचलिकता का यह आग्रह इकतरफा फैसलों का शिकार कैसे हो गया?

उत्तरांचल नाम बीजेपी ने 1980 के दशक के उत्तरार्ध में दिया। इसके पीछे उत्तराखंड के मुद्दे पर आंदोलन चला रहे दलों, खासकर उत्तराखंड क्रांति दल के समानांतर अपना आंदोलन चलाना था। 1994 के आते-आते पार्टी ने इस दिशा में काफी सफलता भी हासिल कर ली और वह नए राज्य का नाम उत्तरांचल रखने में सफल भी हुई, पर इसे आम लोगों के बीच स्वीकार्य बनाने में उसे सफलता नहीं मिल पाई। इसके संकेत 9 नवंबर 2000 की रात देहरादून में देश के इस 27वें राज्य के स्थापना समारोह में सरकार विरोधी नारों के रूप में साफ देखे जा सकते थे। छह वर्षों का मौजूदा अंतराल छोड़ दें तो अविभाजित यूपी के जमाने से चले आ रहे शासकीय दस्तावेजों में इस पर्वतीय भूभाग के लिए उत्तराखंड शब्द का ही उपयोग होता रहा है।

यूपी के पहाड़ी इलाकों में नए राज्य की मांग उठी ही इसलिए थी कि यहां की खास स्थितियां अलग प्रशासनिक इकाई की मांग करती थीं। यानी क्षेत्रीय विकास, आत्मनिर्भरता और बराबरी के आग्रह इस राज्य की रचना के मूल में हैं और 'उत्तराखंड' शब्द उसका प्रतीक है। यह नाम सिर्फ अपनी बुनियाद से ही नहीं जोड़ता, भविष्य के लिए जागरूक भी बनाता है। हालांकि विकास की समस्याओं का हल सिर्फ नाम बदलने से नहीं हो जाता, लेकिन राज्य के प्रति आस्था और वजूद से जुड़े संघर्ष की यह एक बड़ी जीत तो है ही।

Wednesday, March 2, 2011

कुछ गड्वाली सबद और उनके अर्थ

कुछ गड्वाली सबद और उनके अर्थ
१. अल्डो/अल्डु = ठन्डा
२. अचाण्चक/ चाण्चक= अचानक
३. अछ्लेगी= अस्त हो गया
४-अछ्लेणु= अस्त होना
५.अजाक=नासमझ
६. अन्ग्ल्यार- बर्र या ततैया
७. अठ्वाड- बलि देने के लिए आयोजित उत्सव
८- अन्ग्योणु- अपनाना
९- अलोणु-बिना नमक का
१०- अभरोसु- अविश्वास
११- अन्ग्वाल- अन्कमाल/ आलिग्न
१२- अलसिगे- मुर्झा गया/गइ
१३- आछरी- अप्सरा
१४- अल्याचार- लाचार
१५- अफु/अफ्वी- अपने आप
१६- अन्वार/अन्द्वार- सूरत
१७-अबेर- असमय/ देर
1८- अजाण- अनजाना
१९-अप्छाण्यु- अपरिचित
२०- असक्दी- असक्त/ गर्भ्वती स्त्री
२१-अखोड- अखरोट
२२-अडेथणू- किसी व्यक्ति / स्त्री को गन्त्व्य तक पहुचाने के लिए साथ जाना
२३- अडेथदारो- साथ जाने वाला
२४- अधखेचरू - अधकचरा/ अपरिपक्व
२५- अगेती- पहले/ फसल विशेस मे जो पहले पके- जैसे अगेते साटी/ अगेती कौणी
२६- अडी/ अड- जिद्द या अड्ना२
७- अन्तौ- अधैर्य
२८- अधीर्ज- अधीर
२९- अण्ब्य्वायी - अविवाहित
३०- अण्ब्यो- बिना विवाह किये
३१- अचैन्दु- जो चाहा न गया हो/ आइछित्त
३२- अफखौ- जो सिर्फ अपने खाने की इछ्छा रख्ता हो
३३- अलबला सलबल- आनन फानन मे
३४-अन्दयारू- अन्धेरा
३५- अन्ताज- अन्दाज
३६- अक्ड्नु- समाना या एड्ज्स्ट होना
३७- औ बटौ- राह चल्ती/ कुलहीन
३८-अयेडी- जिद
३९-अडाट- भैस आदि का रम्भाना
४०- अडाट- भिडाट= चीख पुकार

Tuesday, March 1, 2011

उत्तराखंडी सिनेमा को नहीं मिल पाई रफ्तार


राज कपूर, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान, मधुबाला तथा काजोल आदि कई हिंदी फिल्म कलाकारों के नाम हमारी जुंबा पर हर समय आते रहते हैं, लेकिन जब बात क्षेत्रीय सिनेमा की होती है तो नामों को गिनना तो दूर याद आना भी मुश्किल हो जाता है, लेकिन इसे किसी त्रासदी से कम नहीं माना जा सकता कि उ8ाराखंड मेंं क्षेत्रीय फिल्मों (गढ़वाली-कुमाऊंनी) के निर्माण एवं इससे जुड़े कलाकारों के लिए सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं दी जा रही है।एक तरफ देश में प्रतिवर्ष ढाई सौ से तीन सौ फिल्मों का निर्माण करोड़ की लागत से हो रहा है। वहीं उ8ाराखंड सिनेमा अपनी रजत जयंती मनाने के बाद भी अभी तक र3तार नहीं पकड़ पाया है। अपने २५ सालों के सफर में कुछ गिनी-चुनी फिल्में हैं जो लोगों के दिलोंं पर अपनी छाप छोड़ पाई हैं। गढ़वाली-कुमाऊंनी सिनेमा के २५ सालों के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो सारी कहानी अपने आप ही सब कुछ बंया कर देती है। ४ मई, १९८३ को पराशर गौड़ ने गढ़वाली फिल्म जग्वाल से क्षेत्रीय सिनेमा को पहचान दिलाने का जो काम शुरू किया था, लेकिन इस दिशा में कोई उत्साह जनक परिणाम नहीं आ पाए। 1या कहते है क्षेत्रीय सिनेमा से जुड़े लोगतेरी सौ, हत्यां, गढ़वाली शोले का निर्माण करने वाले स्वपन फिल्म बैनर से जुडे मदन डुकलान ने बताया कि प्रदेश सरकार से कई बार क्षेत्रीय सिनेमा के बारे में अवगत कराया गया, लेकिन सरकार की ओर से कोई पहल नहंी की जा रही है। श्री डुकलान कहतेे हैं कि यदि सरकार प्रयास करती है तो क्षेत्रीय सिनेमा के माध्यम से जहां प्रतिभाओं को मंच मिलेगा वहीं कई लोगों को रोजगार भी प्राप्त होगा। राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय फिल्मोंंं एवं धारावाहिकों में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके रामेंद्र कोटनाला के अनुसार क्षेत्रीय सिनेमा में धन की कमी, संस्कृति संवद्र्धन की स्पष्ट नीति का न होना तथा सिनेमा हालों की कमी (दूरस्थ क्षेत्रोंं में ) सरकार की ओर से कोई सहायता का न मिलना ही प्रमुख कारण है।

फिर मुड़कर नहीं देखा उत्तराखंड

देहरादून उत्तराखंड के लोग अपने सांसदों की तलाश में हैं। जब से वे उत्तराखंड से राज्यसभा के लिए चुने गए हैं, लोगों ने उन्हें देखा तक नहीं है। यह बात अलग है कि इन सांसदों की विकास निधि निरंतर आ रही है, लेकिन उसकी बंदरबांट कुछ ऊंची पहुंच वालों के माध्यम से ही हो रही है। कांग्रेस शासनकाल में उत्तराखंड कोटे से पहले कै. सतीश शर्मा उसके बाद सत्यव्रत चतुर्वेदी राज्यसभा के लिए चुने गए थे। राज्यसभा के लिए बाहरी नेताओं को चुने जाने का दबी जुबान में विरोध भी हुआ था, लेकिन हाईकमान के सामने यह नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुई। चुने जाने के बाद उन्होंने बड़े-बड़े दावे किए थे। उत्तराखंड के प्रतिनिधित्व की कीमत दिल्ली में चुकाने का वादा करने वाले उत्तराखंड की तरफ एक बार भी लौटकर नहीं आए। हालांकि कांग्रेस नेता रामशरण नौटियाल दावा करते हैं कि सतीश शर्मा दून, उत्तरकाशी तथा टिहरी में कई बार आ चुके हैं। यह तय है कि इन जन प्रतिनिधियों को उत्तराखंड से कोई लेना देना नहीं है। ये सिर्फ हाईकमान की मर्जी से राज्य पर थोपे गए हैं लेकिन जब तक ये उत्तराखंड के जनप्रतिनिधि हैं, इनकी सांसद निधि पर तो उत्तराखंड का हक है। सतीश शर्मा 04-05 में चुने गए थे। इस वित्तीय वर्ष में उनकी निधि से 88.316 लाख रुपये मंजूर हुए थे। इसमें देहरादून को सबसे अधिक 22.90 लाख, टिहरी को 20.80 लाख, उत्तरकाशी को 17.50 लाख, नैनीताल को 11.986 लाख, ऊधमसिंह नगर को 9.58 लाख और चमोली को 5.55 लाख रुपये दिए गए हैं। कन्या कुमारी को 11 लाख दिए गए हैं। वर्ष 05-06 में भी 190.200 लाख रुपये श्री शर्मा की निधि से स्वीकृत हुए हैं। इस वर्ष भी देहरादून, उत्तरकाशी, टिहरी को टॉप प्रायरिटी दी गई। हरिद्वार तथा चमोली जिले को कुछ नहीं मिला, अन्य जिलों के हिस्से कुछ आया है। 06-07 में भी वही कहानी दोहराई गई है। 07-08 में देहरादून के हिस्से कम आया है लेकिन उत्तरकाशी और टिहरी फिर भी आगे रहे हैं। सत्यव्रत चतुर्वेदी 06-07 में राज्य सभा के लिए चुने गए। इस वर्ष उन्होंने 196.9 लाख रुपये मंजूर किए। पौड़ी, देहरादून, ऊधमसिंह नगर, अल्मोड़ा उनकी सूची में सबसे ऊपर हैं। वर्ष 07-08 में उन्होंने दो करोड़ से अधिक की स्वीकृतियां दी। नैनीताल, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और हरिद्वार को उन्होंने प्राथमिकता दी।

संघर्ष स्वभाव है पर्वतीय नारी का


देश-दुनिया के लिए आठ मार्च का दिन महिलाओं के संघर्ष को याद करने का दिन है, लेकिन देवभूमि का तो अस्तित्व ही महिलाओं पर टिका है। सामाजिक सरोकारों से जुड़ा शायद ही कोई क्षेत्र होगा, जहां उत्तराखंडी महिलाओं ने प्रतिमान न स्थापित किए हों। पर्वतीय नारी के लिए संघर्ष कोई तमगे हासिल करने का जरिया नहीं है। संघर्ष तो उसके स्वभाव में है और इसी जुझारू प्रवृत्ति ने उसे दुनियाभर में अलग पहचान दी है। पहाड़ का भूगोल जितना जटिल है, अन्य परिस्थितियां भी उसी के अनुरूप जटिल रही हैं। यही वजह है कि यहां ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी लोकगीतों व पंवाड़ों में ही ज्यादा मिलती है। इतिहास में पहले-पहल जिस वीर नारी का उल्लेख मिलता है, वह है रानी कर्णावती, जिसने मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना से लोहा लिया। वीरबाला तीलू रौतेली, मालू रौतेली आदि वीरांगनाओं का इतिहास को भी कालांतर में प्रचलित लोक गाथाओं से ही लिपिबद्ध किया गया। वर्ष 1805 से लेकर 1815 तक उत्तराखंड के अधिकांश हिस्से में गोरख्याणी का राज रहा और इसकी सर्वाधिक त्रासदी यहां महिलाओं ने ही झेली। गोरखा आक्रमण में अपनी जान देकर लोगों की जान बचाने वाली कोलिण जगदेई तो आज लोकदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली बिशनी देवी शाह को कौन भुला सकता है। यह वह महिला हैं जिन्होंने आजादी के लिए जेल जाने वाली उत्तराखंड की प्रथम महिला बनने का गौरव हासिल किया। चिपको आंदोलन की सूत्रधार रैणी गांव की गौरा देवी का नाम तो पूरी दुनिया में आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने स्वयं स्कूल का मुंह नहीं देखा, लेकिन दुनिया के लिए उनका पूरा जीवन ही एक किताब बन गया।साठ के दशक में गढ़वाल के शराब विरोधी आंदोलन को स्वर देने वाली टिंचरी माई स्वयं में संघर्ष की अनूठी मिसाल हैं। 19 साल की उम्र में विधवा होने पर भी वह टूटी नहीं। टिंचरी माई ने शराब की दुकानें जलाकर इसके खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका। जेल होने पर भी उन्होंने ऐलान किया मैं यहीं रुकने वाली नहीं हूं। पहाड़ी महिला जानती है कि जल, जंगल, जमीन के बिना मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। इसीलिए वह पहाड़ी समाज के घर यानि जल, जंगल और जमीन की लड़ाई में पहली पांत में रही है। नशा नहीं रोजगार दो, टिहरी के विस्थापितों के पुनर्वास का आंदोलन बगैर महिलाओं की भूमिका के शायद ही मुकाम हासिल कर पाते। उत्तराखंड आंदोलन में तमाम घरेलू कार्यो के बावजूद महिलाओं की भागीदारी अविश्र्वसनीय है। सबसे पहले शहीद होने वालों में बेलमती चौहान, हंसा धनाई की बहादुरी भला भुलाई जा सकती है। यह तो सिर्फ बानगी है। पहाड़ी महिला का संघर्ष तो कभी न खत्म होने वाली गाथा है। वह सिर्फ घर-परिवार में ही नहीं जूझती, खेतों में हल भी चलाती है। जंगलों में गुलदार, बाघ, भालू, सूअर जैसे हिंसक जीवों से संघर्ष तो मानो उसकी जीवनचर्या का हिस्सा बन गया है। फिर भी लगता है कि पर्वतीय नारी आज भी वहीं खड़ी है, जहां वह दशकों पहले थी। लड़ के लेंगे, भिड़ के लेंगे, छीन के लेंगे उत्तराखंड का नारा बुलंद करने वाली पहाड़ी महिला का असमानता मुक्त बेहतर समाज का सपना अभी भी दूर है।