Thursday, February 24, 2011

पहाड़ आवा हमरि पर्यटन कि दुकानि खुलिगेन पहाड़ आवा


पहाड़ आवा हमरि पर्यटन कि दुकानि खुलिगेन पहाड़ आवा ............................. हमरि चा कि दुकान्यों मा ‘तू कप- टी’ बोली जावा पहाड़ आवा ................................ हमरा गुमान सिंग रौतेल्लौं डालर. ध्यल्ला, पैसा दे जावा पहाड़ आवा .............................. पहाड़ पर घास लौंदी मनख्यणि कु फ़ोटो खैंचि जावा पहाड़ आवा .............................. देव धामूं मा द्यब्ता हर्चिगेन पांच सितारा जिमी जावा पहाड़ आवा ................................. परर्कीति पर बगच्छट्ट ह्वेकि कचरा गंदगी फ़ोळी जावा पहाड़ आवा ................................. हम लमडि छां बौगि छां रौड़ि छां/ तुम कविलासुं मा घिस्सा- रैड़ि रंगमतु खेलि जावा पहाड़ आवा ............................

भालू लिखू या बुरु लिखू यान ना सोचा दागडियो की क्या चा लिखू


भालू लिखू या बुरु लिखू यान ना सोचा दागडियो की क्या चा लिखू
अँधेरा मा सोची कन और उजाला मा बेटी कन चा लिखू
मी तय अपनी कविता और अपना हुनर सब लोगो तय दिखाण चा
अपणु उत्तराखण्ड कु नाम हर जगह मा रोशन कन चा बस एक या ही तमना चा मेरी
जरा मेरु काम वे जा उत्तराखण्ड का कवियों का दगडी मा हिमांशु बिष्ट कु नाम भी जुड़ जा
.......

पूर्णागिरि में पूर्ण होती मनोकामना


देवभूमि उत्तराखण्ड में स्थित अनेकों देवस्थलों में दैवीय-शक्ति व आस्था के अद्भुत केन्द्र बने पूर्णागिरि धाम की विशेषता ही कुछ और है। जहां अपनी मनोकामना लेकर लाखों लोग बिना किसी नियोजित प्रचार व आमन्त्रण के उमड पडते हैं जिसकी उपमा किसी भी लघु कुंभ से दी जा सकती है। टनकपुर से टुण्यास तक का सम्पूर्ण क्षेत्र जयकारों व गगनभेदी नारों से गूंज उठता है। वैष्णो देवी की ही भान्ति पूर्णागिरि मन्दिर भी सभी को अपनी ओर आकर्षित किए रहता है। हिन्दू हो या मुस्लिमए सिख हो या ईसाई, सभी पूर्णागिरि की महिमा को मन से स्वीकार करते हैं। देश के चारों दिशाओं में स्थित कालिकागिरि, हेमलागिरि व मल्लिकागिरि में मां पूर्णागिरि का यह शक्तिपीठ सर्वोपरि महत्व रखता है। समुद्रतल से लगभग 3 हजार फीट ऊंची धारनुमा चट्टानी पहाड के पूर्वी छोर पर सिंहवासिनी माता पूर्णागिरि का मन्दिर है जिसकी प्रधान पीठों में गणना की जाती है। संगमरमरी पत्थरों से मण्डित मन्दिर हमेशा लाल वस्त्रोंए सुहाग.सामग्रीए चढावाए प्रसाद व धूप-बत्ती की गंध से भरा रहता है। माता का नाभिस्थल पत्थर से ढका है जिसका निचला छोर शारदा नदी तक गया है। देवी की मूर्ति के निकट स्थित इस स्थल पर ही भक्तगण प्रसाद चढाते व पूजा करते हैं। मन्दिर में प्रवेश करते ही कई मीटर दूर से पर्वत शिखर पर यात्रियों की सुरक्षा के लिए लगाई गई लोहे के लंबे पाइपों की रेलिंग पर रंग-बिरंगी पोलोथीन पन्नियों व लाल चीरों को बंधा देकर यात्रीगण विस्मित से रह जाते हैं। देवी व उनके भक्तों के बीच एक अलिखित अनुबंध की साक्षी ये रंग-बिरंगी लाल-पीली चीरें आस्था की महिमा का बखान करती हैं। मनोकामना पूरी होने पर फिर मन्दिर के दर्शन व आभार प्रकट करने और चीर की गांठ खोलने आने की मान्यता भी है। टनकपुर से टुण्यास व मन्दिर तक रास्ते भर सौर ऊर्जा से जगमगाती ट्यूबलाइटें, सजी-धजी दुकानें, स्टीरियो पर गूंजते भक्तिगीत, मार्ग में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं, देवी के छन्द गाती गुजरती स्त्रियों के समूह सभी कुछ जंगल में मंगल सा अनोखा दृश्य उपस्थित करते हैं। रात हो या दिन चौबीस घंटे मन्दिर में लंबी कतारें लगी रहती हैं। मस्तक पर लाल चूनर बांध या कलाई में लपेटे भूख प्यास की चिन्ता किए बिना जोर.जोर से जयकारे लगाते लोगों की श्रद्धा व आध्यात्मिक अनुशासन की अद्भुत मिसाल यहां बस देखते ही बनती है। चारों ओर बिखरा प्राकृतिक सौन्दर्य ऊंची चोटी पर अनादि काल से स्थित माता पूर्णागिरि का मन्दिर व वहां के रमणीक दृश्य तो स्वर्ग की मधुर कल्पना को ही साकार कर देते हैं। नीले आकाश को छूती शिवालिक पर्वत मालाएं, धरती में धंसी गहरी घाटियां, शारदा घाटी में मां के चरणों का प्रक्षालन करती कल-कल निनाद करती पतित पावनी सरयूए मन्द गति से बहता समीरए धवल आसमानए वृक्षों की लंबी कतारेंए पक्षियों का कलरव, सभी कुछ अपनी ओर आकर्षित किए बिना नहीं रहते। चैत्र व शारदीय नवरात्र प्रारंभ होते ही लंबे.लंबे बांसों पर लगी लाल पताकाएं हाथों में लिए सजे धजे देवी के डोले व चिमटा, खडताल मजीरा, ढोलक बजाते लोगों की भीड से भरी मिनी रथ यात्राएं देखते ही बनती हैं। वैसे श्रद्धालुओं का तो वर्ष भर आवागमन लगा ही रहता है। यहां तक कि नए सालए नए संकल्पों का स्वागत करने भी युवाओं की भीड हजारों की संख्या में मन्दिर में पहुंच साल की आखिरी रात गा.बजा कर नए वर्ष में इष्ट मित्रों व परिजनों के सुखए स्वास्थ व सफलता की कामना करती हैं।

Tuesday, December 28, 2010


""नारी की व्यथा "
जीवन के अतीत में झांकने बैठी मै
पायी वहां दर्दनाक यादें और रह गयी स्तब्ध मै
समूचा अतीत था घोर निराशा और अवसाद में लींन
कुछ भी न था वहां खुशनुमा बन गई जिंदगी उत्साह हीन
बदरंग हो चुके थे सपने जीवन पथ था शब्दहीन
बच्चे भर रहे थे नए रंग, भबिष्य ने बुने सपने
यादें कर दी धूमिल सजा दिए रंग जीवन में अपने
मै आज तक ढो रहीं थी उन लाशो का गट्ठर
तिल तिल कर जी रही प्रतिदिन मर मरकर
शर्म और हया का उतार फेंका झीना आवरण
बच्चो ने था ठहराया सही यही मेरी तपस्या का है फल
किसी बक्त भी अगर गिर जाती थी मै नजरो में संतान की
जी न पाती उन लाशों के भी कई गुना बोझ से
आज सर उठा कर जीती हूँ पाती हूँ उस दर्द से मुक्ति
नारीं जीवन की यही त्रासदी, फिर भी है वो दुर्गा शक्ति
पहले कुचली गई अपनों से, फिर सहा संतापं
यहाँ दबकर जमाना भी देता है कभी कभी घातक सा ताप
बरसो से यही है नारी की पीड़ा, भोगा इसको कभी सीता ने
सीता ने दी अग्नि परीक्षा, और अंतिम बेला पाया ढेर तिरस्कार
चली आ रही है यही परीक्षा, तिरस्कार और संताप
पाई न इससे कभी मुक्ति नारी हो तुम कैसी शक्ति
पूजी जाती अम्बा, दुर्गा और कहलाती पूर्ण शक्ति
कयूं नहीं मिलता नारी को सम्मान कियूं होता हर पथ पर तिरस्कार ?????????? रोशी

Sunday, December 5, 2010

उत्तराचल के चार विरासत या धरोहर के प्रतीक हैं:-राज्यपुष्प ब्रह्म कमल;


उत्तराचल के चार विरासत या धरोहर के प्रतीक हैं:-राज्यपुष्प ब्रह्म कमल;
ब्रह्म कमल यहाँ का राज्य पुष्प है। वेदों में भी इसका उल्लेखमिलता है। यह कश्मीर, मध्य नेपाल, उतराखंड में फूलों कीघाटी, केदारनाथ, शिवलिंग, बेस, पिंडापी, ग्लेशियर, आदि में३६०० मीटर की ऊँचाई पर पाया जाता है। पौधों की ऊँचाई७०-८० से.मी. होती है। जुलाई से सितम्बर के मध्य यह जहाँखिलता है वहीं का वातावरण सुगंध से भर जाता है। पुष्प केचारों ओर कुछ पारदर्शी ब्लैडर के समान पत्तियों की रचनाहोती है जिसको स्पर्श कर लेने मात्र से उसकी सुगंध कई घंटोंतक अनुभव की जा सकती है। इसकी जडों में औषधीय गुणहोते है। यह दुर्लभ प्रजाति का विशेष पुष्प है। इतिहास एवंधार्मिक ग्रंथों में इस पुष्प का कई स्थलों पर उल्लेख मिलता है

Friday, November 12, 2010


:) आज उत्तराखंड का शिक्षित युवा वर्ग रोजगार का आभाव म अपनी जन्मभूमि सी
पलायन करणा कें मजबूर छ ,करण केवल एक रोजगार का साधनों की कमी | मैं कखी
पढ़ी थोऊ की पिछला 10 वर्षु मा पहाड़ सी 12 लाख सी भी ज्यादा लोग पलायन
करी ग्येन | निरंतर पलायन सी विकास पर असर पड़ण लग्य्नु छ अगर हम केवल
सांसद तथा विधायक निधि पर विशेषण करू त ये वजह सी पर्वतीय क्षेत्र थैं
लगभग १६ करोड़ रूपए सालाना नुकसान होनु चा । ई औसत सी प्रदेश की 4 हजार
करोड़ की मानक विकास योजना कि बात करी जाए त पर्वतीय क्षेत्र थैं साल भर
माँ 30 करोड़ रूपयों की हानि होणि चा । निरंतर पलायन सी असर जनसँख्या पर
भी पड़ी और हमारा राज्य मा जह्संख्या का हिसाब सी आठ विधान सभा की सीट कम
ह्वै ग्येन | लगभग 40 करोड़ रूपये की वार्षिक विधायक निधि जू की यौं आठ
विधानसभा सीटो थीं मिलदी वै सी हम सबी वंचित ह्वै गयौं | पहाड़ सी पलायन
कु असर पर्वतीय क्षेत्रो थैं मिलण वाळी योजनाओ पर भी पड़लू | हालाकि
मैदानी क्षेत्रो मा कुछ बड़ा उधमियो न अपना प्लांट स्थापित जरुर करी छन
परन्तु तब भी पहाड़ का युवाओ थैं रोजगार का अवसर अभी भी गिन्या -चुन्या छन
| जरुरत च एक मजबूत निति बनौन की जैसी उत्तराखंड का मूल निवासियों कें वखि
रोजगार मिलो और पहाड़ का लोग पलायन का वास्ता मजबूर न हो सक्या......

Saturday, July 31, 2010


उत्तराखंड में एक ऐसा भी गाँव है जहा नही होते है पंचायत चुनाव

हिमाच्छादित गगनचुम्बी पर्वत श्रृंखलाओं से बीच चीन की सीमा से सटा भारत का एक गांव माणा आज भी अपनी पारंपरिक ओर प्राकृतिक विरासत को संजोए हुए है। समूचे देश में भले ही छोटे-छोटे चुनाव में प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर होती हो मगर यहां आज तक ग्राम पंचायत के लिए वोट नहीं डाले गए। सुनने में जरूर अटपटा लगता है कि विगत 100 साल से यहां ग्राम के मुखिया निर्विरोध चुनते आ रहे हैं।


चीन की सीमा से कुछ मील की दूरी पर बसा माणा देश का आखिरी गांव है।
हिन्दू आस्था के केन्द्र बदरीनाथ धाम से मात्र तीन किमी पैदल चलने के बाद पड़ने वाले इस गांव में नैसर्गिक सुन्दरता का अकूत खजाना है। माणा में ख्ेाती भी होती है और मंदिरों में पूजा भी। यहां का जीवन सोंधी खुशबू को समेटे है। नई बात यह है कि भोटया जनजाति के लगभग 300 परिवारों वाले इस गांव में प्रधान का चुनाव वोट डालकर नहीं होता। वर्ष 1962 के चीन युद्ध के बाद माणा को 1988 में नोटिफाईड एरिया बदरीनाथ से सम्बद्ध किया गया था। 1989 में पंचायत का दर्जा मिलने के बाद से आज तक यहां के निवासी अपने प्रधान का चयन आपसी सहमति से करते आ रहे हैं। यहां पहले प्रधान राम सिंह कंडारी से लेकर निवर्तमान ग्राम प्रधान पीताम्बर सिंह मोल्फा निर्विरोध चुने गए। यहां की आजीविका आलू की खेती,भेड़, बकरी पालन है। 1785 की जनसंख्या वाले छोटे से गांव में चंडिका देवी, काला सुन्दरी, राज-राजेश्वरी,भुवनेश्वरी देवी,नन्दा देवी,भवानी भगवती व पंचनाग देवता आदि के मन्दिरों में भोटया जनजाति की उपजातियों के लोगों का अधिकांश समय अपनी-अपनी परम्परा निभाने व धार्मिक अनुष्ठान में बीतता है। माणा में वन पंचायत भी गठित है जिसका विशाल क्षेत्रफल लगभग 90 हजार हेक्टेअर तक फैला है। यहां मौजूद भगवान बद्रीनाथ के क्षेत्रपाल घण्टाकर्ण देवता का मन्दिर अपनी अलग पहचान रखता है। कई खूबियों के बावजूद यहां भी कुछ कष्ट हैं। बद्रीनाथ के कपाट बन्द होने से कपाट खुलने तक पर यह पूरा क्षेत्र सेना के सुपुर्द रहता है। इस कारण ग्रामीणों को शीतकाल के 6 माह अपना जीवन सिंह धार, सैन्टुणा, नैग्वाड़, घिंघराण,नरौं, सिरोखुमा आदि स्थानों पर बिताना पड़ता है। दूसरी विडंबना यह है इन्टर तक के विद्यार्थी छह माह की शिक्षा माणा में लेते हैं और छह माह 100 किमी दूर गोपेश्वर के विद्यालयों में। यहां टेलिफोन, बिजली और पानी जैसी सुविधा तो हैं उपचार कराने को अस्पताल नहीं। ग्राम प्रधान पीताम्बर सिंह मोल्फा ने बताया कि देश-विदेश से बदरीनाथ पहुंचने वाले कई अति विशिष्ट व्यक्ति और मंत्रीगण माणा को देखने तो आते हैं लेकिन गांव के विकास को वादों के अलावा कुछ नहीं देते। देश विशेष पहचान रखने वाले इस गांव को अभी भी विकास का इंतजार है।........ जय पहाड़ तू महान
हिमांशु बिष्ट :- ९९९९ ४५१ २५०