Wednesday, June 9, 2010

आज फिर उनको हमारा ख्याल आया सपने में आकर चुपके से मुझे जगाया

[आज फिर उनको हमारा ख्याल आया
सपने में आकर चुपके से मुझे जगाया]

~ ~ ~ आज फिर वूं  तै~ ~ ~

आज फिर वूं तै मेरो ख्याल आई
सुपिना मा आई कन मितै जगाई

बुलण बैठी भूली जाओ ब्याला कि कहानी
अब  फिर शुरु करला हम एक नै कहानी

तुमि ते मी अपरु सहारा बणान चांदू
तुमि तै अपरु प्यार मी  बणान चांदू

तुम्ही छंया म्यार श्रृंगार - दर्पण 
करणू छौ तुम्ही ते मी सब अर्पण

आज फिर मितै अपरु गल लगे ल्याओ
अपरु नाराज़ दिल ते अब  मनै ल्याओ

अब ज्यादा नी करि सकद मी इंतज़ार
खडू छौ मी लेकन फूलूँ कू  हार 

आज फिर वूं तै मेरो ख्याल आई
सुपिना मा आईकन मितै जगाई


- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, अबु धाबी, यूएई


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)


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Bisht G  bishtb50@gmail.com
Contt:-   9999 451 250

Friday, May 28, 2010

टिरी डाम से कतना परिवार बेघर हुई

टिरी डाम से कतना परिवार बेघर हुई गेनी उथे अपनी घर कुड़ी सेरा पुंगडा सब छोड़ के जानि पड़ी और आप ते ताज्जुब होलू की उत्तराखंड एक छोटू सु राज्य च और उत्तराखंड सरकार अन 500 से जादा डाम प्रस्तावित करिया छन एक डाम से इतना बरबादी भेए वे का बाद ५०० डाम बन्नाला इतना छोटा सा राज्य माँ और तब क्या भविष्य होलू उत्तराखंड का, जब आप कभी छुट्टी जेयला लोटिक उत्तराखंड जेयला इन भी हो सकदा की बुलुं भाई की, आप लोग घर खाली करा एक सिर्फ बिजली घर राला इ पेरें थोडा आप भी विचार करा, उत्तराखंड सरकार और कोई तरीका नहीं उथे पैसा पैदा करने कु नज़र अणू च वो हमारी नदी, दांडी काठी , उथे प्राइवेट कंपनी कु बेच बाच कर डाम बनानी च ५०० से जादा आपका हर घर का पास एक डाम होलू वेका बाद जो हाई टेंसन बिजली की लाइन उख बाटी जानि छन उका तोल रेना वाला लोगों का की हाल होलो उख जो झील बनली च उका तोल कतना सभ्यता डूब जाली... इ फारेन आप प्रवासी बंधू भी जरा विचार करों.

Saturday, May 22, 2010

पहाड़ मैं होगा सब पहाडी , एक होगा पैदा ऐश पहाडी !



पहाड़ मैं होगा सब पहाडी , एक होगा पैदा ऐश पहाडी !
फिर न कही अँधेरा मैं होगा अपना पहाडी , सूरज उगेगा मेरे पहाडी वैभव का
पहाड़ का घर-घर अपना फेरा होगा, एक होगा पैदा ऐश पहाडी !!

पहाडी बोली की होगी अपनी बस्तिया , चमकता हुवा हर पहाडी चेहरा होगा !
प्रहरी सुख पहाड़ का घेरा अपना होगा , हर गुज मैं गुजेगा पहाडी अपना होगा !!
हर जुबान पै पहाड़ का पहाडी नारा होगा , उन्नति -प्रगति मैं अपना पहाडी होगा !

तब सुंदर उत्तराखंड पहाड़ हमारा अपना होगा , जब महकेगा पहाडी का पाणी , माटी!
उस दिन धन्य होगा पहाड़ का अपना पहाडी , हर होगा ऐश अपना पहाडी
जिस से धन्य होगा अपना सब पहाडी , जल्दी पैदा होगा अपना पहाडी !!

जय पहाडी भूमि के म्यएर सत सत नमन छु , हर पहाडी जुबान पै पहाड़ लिजी नमन छु
अब हमर पहाड़ ले आपुड़ मैं मग्न छु , हिन्दुतान मैं आपु मैं उ चमन छु पहाडी !!

पहाड़ मैं होगा सब पहाडी , एक होगा पैदा ऐश पहाडी !
फिर न कही अँधेरा मैं होगा अपना पहाडी , सूरज उगेगा मेरे पहाडी वैभव का
पहाड़ का घर-घर अपना फेरा होगा, एक होगा पैदा ऐश पहाडी !!

पहाडी बोली की होगी अपनी बस्तिया , चमकता हुवा हर पहाडी चेहरा होगा !
प्रहरी सुख पहाड़ का घेरा अपना होगा , हर गुज मैं गुजेगा पहाडी अपना होगा !!
हर जुबान पै पहाड़ का पहाडी नारा होगा , उन्नति -प्रगति मैं अपना पहाडी होगा !

तब सुंदर उत्तराखंड पहाड़ हमारा अपना होगा , जब महकेगा पहाडी का पाणी , माटी!
उस दिन धन्य होगा पहाड़ का अपना पहाडी , हर होगा ऐश अपना पहाडी
जिस से धन्य होगा अपना सब पहाडी , जल्दी पैदा होगा अपना पहाडी !!

जय पहाडी भूमि के म्यएर सत सत नमन छु , हर पहाडी जुबान पै पहाड़ लिजी नमन छु
अब हमर पहाड़ ले आपुड़ मैं मग्न छु , हिन्दुतान मैं आपु मैं उ चमन छु पहाडी !!

bishtb50@gmail.com
Bisht G
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Friday, May 21, 2010

तेरी गोद मैं सोना है मुझे पहाड़,जी भर के रोना है पहाड़

तेरी गोद मैं सोना है मुझे पहाड़ . जी भर के रोना है पहाड़
तू सुला दे मुझे अपने आचल की छाव मैं पहाड़
तू है मेरा  सुकून मुझे वही रहना है तेरे पाउ मैं पहाड़ !!!

मुझको बचपन का मासूम फ़रिश्ता याद देगी तेरी गोद
जो ना जाने ज़माने मैं किशी आपने का बोझ
तू सुला दे मुझे नींद वैसी फिर अपनी गोद पहाड़
अब और गम नहीं सहना है मेरे अपना पहाड़

तेरे सीने से लग कर हलका होगा मेरा  गम एक दम
तेरी यादु में  पहाड़ मुझे मिलेगा अपना बचपन का जन
तेरी हवा मेरी दवा है तेरी ही हम पर दया का एक अंस
तेरे ही पास ही मेरे अपना है जीवन का एक छण  भर !!!

मैं तरसता रहा तेरी गोद के लिए पहाड़
तेरी कलकल छाऊ को .. तेरी घास को , तेरी हर लहराती ब्याव को पहाड़
तेरी ही अमानत से जन्नत का खिलौना है मेरे पहाड़ !!!

है ये दुःख जहा देता है रोज़ दर्द के कुछ घाऊ
मैं भुला  ना कहा सुकून  मिलता है पहाड़ सकुन
तुझसे दूर हो गया हूँ तो हर कोई ठोकर लगा रहा है मुझे
मैं बहुत रूट गया हु , मुझे बुला ले अब अपने पहाड़ !!!

मैं अब रुक ना सकू चलते चलते इन ज्ख्मु पर
दर्द होता है ज्ख्मु पर मलहम लगा  दे अपना पहाड़
जल्दी से बुला ले तू पहाडी को उस का अपना पहाड़
वो दोडा-२ कर आएगा अपना पहाड़ ......................

म्यर पहाड़ ........................वार पार म्यर पहाड़


bishtb50@gmail.com
Contt....9999451250

Saturday, May 15, 2010

भारत की दूसरी सरकारी क्षेत्रिय भाषाएँ

क्या आपको पता है कि भारत में लगभग ३० लाख गढ़वाली और ३० लाख कुमाऊँनी बोलने वाले लोग हैं लेकिन फिर भी गढ़वाली-कुमाऊँनी को आठवीं अनुसूची में भारत की सरकारी क्षेत्रिय भाषा के रूप में शामिल नहीं किया गया है l भारत की दूसरी सरकारी क्षेत्रिय भाषाएँ हैं... बोडो - 12 लाख वक्ता, डोगरी- 01लाख, मणिपुरी- 15लाख और कोंकणी, सिन्धी, नेपाली - प्रत्येक 25 लाख वक्ता

Monday, April 26, 2010

औली में प्रकृति ने अपने सौन्दर्य को खुल कर बिखेरा है।

औली उत्तराखण्ड का एक भाग है। यह 5-7 किमी. में फैला छोटा-सा स्की रिसोर्ट है। इस रिसोर्ट को 9,500-10,500 फीट की ऊंचाई पर बनाया गया है। यहां बर्फ से ढकी चोटियां बहुत ही सुन्दर दिखाई देती हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 23,000 फीट है। यहां पर देवदार के वृक्ष बहुतायत में पाए जाते हैं। 

 औली में प्रकृति ने अपने सौन्दर्य को खुल कर बिखेरा है। यात्रा करते समय आपको गहरी ढ़लानों और ऊंची चढाई चढ़नी पड़तीं है। यहां पर सबसे गहरी ढलान 1,640 फुट पर और सबसे ऊंची चढा़ई 2,620 फुट पर है। यहां पर केवल स्किंग और केवल स्किंग की जा सकती है। इसके अलावा यहां पर अनेक सुन्दर दृश्यों का आनंद भी लिया जा सकता है। नंदा देवी के पीछे सूर्योदय देखना एक बहुत ही सुखद अनुभव है। नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान यहां से 41 किमी. दूर है। 

यहां पर स्की करना सिखाया जाता है। गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने यहां स्की सिखाने की व्यवस्था की है। यह ट्रेनिंग हर वर्ष जनवरी-मार्च में दी जाती है। मण्डल के अलावा निजी संस्थान भी ट्रेनिंग देते हैं।


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Bisht G
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Wednesday, April 21, 2010

एक सुन्दर सा फूल ‘फयूंली’


पहाड़ की चोटी पर, खेतों की मेड़ों पर, एक पीला फूल होता है। लोग उसे ‘फयूंली’ कहते हैं।
   कहीं एक घना जंगल था। उस जंगल में एक ताल था और उस ताल के पास नरी-जैसी एक वन-कन्या रहती थी। उसका नाम था फयूंली।
   कोसों तक वहां आदमी का नाम न था। वह अकेली थी, बस उसके पास वनके जीव-जन्तु और पक्षी रहते थे। वे उसके भाई-बहन थे-बस प्यार से पाले-पोसे हुए। यही उसका कुटुम्ब था। वह उन सबकी अपनी-जैसी थी। हिरनी उसके गीतों में अपने को भूल जाती थी। फूल उसे घेरकर हंसते थे, हरी-भरी दूब उसके पैरों के नीचे बिछ जाती और भोर के पंछी उसे जगाने को चहचहा उठते थे। वहउनसबकी प्यारी थी।
   वह बहुत खुश थी। सुन्दर भी थी। उसके चेहरे पर चांद उतर आया था। उसके गालों में गुलाब खिले थे। उसके बालों पर घटाएं घिरी थीं। ताल के पानी की तरह उसकी जवानी भरती जा रही थी। उस रूप को न किसी ने आंखों से देखा था, न हाथों से छुआ  था।
   उस धरती पर कभी आदमी की काली छाया न पड़ी थी। पाप के हाथों ने कभी फूलों की पवित्रता को मैला न किया था। इसीलिए जिन्दगी में कहीं लोभ न था, शोक न था। सब ओर शांति और पवित्रता थी। फयूंली निडर होरक वनों में घूमती, कुंजों में पेड़ों के नये पत्ते बिछाकर लेटती, लेटकर पंछियों के सुर में अपना सुर मिलाती, फिर फूलों की माला बनाती और नदियों की कल-कल के साथ नाचने लगती। थी तो अकेली, पर उसकी जिन्दगी अकेली न थी।
   एक दिन वह यों ही बैठी थी। पास ही झरझर करता एक पहाड़ी झरना बह रहा था वहां एक बड़े पत्थर का सहारा लिए वह जलमें पैर डाले एक हिरन के बच्चे को दुलार रही थी। आंखें पानी की उठती तरंगों पर लगी थीं, पर मन न जाने किस मनसूबे पर चांदनी-सा मुस्करा रहा था। तभी किसी के आने की आहट हुई। हिरनका बच्चा डर से चौंका। फयूली नेमुड़कर देखा तो एक राजकुमार खड़ा था। कमलके फल जैसा कोमल और हिमालय की बरफ जैसा गोरा। फयूंली ने आज तक किसी आदमी को नहीं देखा था। उसे देखकर वह चांद-सी शरमा गई, फूल-सी कुम्हला गई। राजकुमार प्यासा था। मन उसका पानी में था, पर फयूली को देखते ही वह पानी पीला भूल गया। फयूंली अलग सरक गयी। राजकुमार ने अंजुलि बनायी और पानी पीने लगा। पानी पिया तो फयूंली ने राजकुमार से पूछा, “शिकार करने आये हो ?”
   राजकुमार ने कहा, “हां।”
   फयूंली बोली, “तो आप चले जाइये। यह मेरा आश्रम है। यहां सब जीव-जन्तु मेरे भाई-बहन हैं। यहां कोई किसी को नहीं मारता। सब एक-दूसरे को प्यार से गले लगाते हैं।”
   राजकुमार हंसा। बोला, “मैं भी नहीं मारूंगा। यहां खेल-खेल में चला आया था। खैर, न शिकार मिला, न अब शिकार करने की इच्छा है। इतनी दूर भटक गया हूं कि.....”
इतना कहकर राजकुमार चुप हो गया। फिर कुछ समय के लिए कोई कोई किसी से नहीं बोला। फयूंली ने आंखों की कोर से उसे फिर एक बार देखा। वह सोच न पाई कि आगे उससे क्या कहे, क्या पूछे, पर न जाने वह क्यों उसे अच्छा लगा।
यों ही उसके मुख से निकल पड़ा, “आप थके हैं। आराम कर लीजिये।”
   राजकुमार एक पत्थर के ऊपर बैठ गया। संध्या हाने लगी थी। आसमान लाल हुआ। वन में लौटते हुए पश-पक्षियों का कोलाहल गूंज उठा। देखते-ही-देखते फयूली के सामने कंद-मूल और जंगली फलों का ढेर लग गया। यह रोज की ही बात थी। रोज ही तो वन के पशु-पक्षी-उसके वे भाई-बहन-उसके लिए फल-फूल लेकर आते थे। वह उन सबकी रानी जो थी।
   राजकुमार ने यह देखा तो बाला, “वनदेवी, तुम धन्य हो! कितना सुख है यहां ! कितना अपनापन है ! काश, मैं यहां रह पाता !”
   फयूंली ने टोका, “बड़ों के मुंह से छोटी बातें शोभा नहीं देतीं। तुम यहां रहकर क्या करोगे ? राजकुमार को वनों से कया लेना-देना। उन्हें तो अपनेमहल चाहिए, बड़े-बड़े शहर चाहिए, जहां उन्हें राज करना होता है।”
   राजकुमारने कहा, “जंगल में ही मंगल है, तुम भी तो राज ही कर रही हो यहां।”
   फयूंली मुस्करा उठी। बोली, “नहीं।”
   अंधेरा हो चुका था। फयूंली ने राजकुमार का फूलों से अभिनन्दन किया ओर फिर वह अपनी गुफा में चली गई। राजकुमार भी पेड़ के नीचे लेट गया।
   सांझ का अस्त होता सूरज फिर सुबह को पहाड़ की चोटी पर आ झांका। राजकुमार जागा तो उसे घर का ख्याल आया। वह उदास हा उठा। फयूंली उसके प्राणों में खिलनेको आकुल हो उठी। अब उसका जाने का जी नहीं कर रहा था। सुबह कलेवा लेकर

फयूंली आई तो राजकुमार मन की बात न रोक सका, बाला, “एक बात कहना चाहता हूं। सुनोगी ?”




-- पहाड़ की चोटी पर, खेतों की मेड़ों पर, एक पीला फूल होता है। लोग उसे ‘फयूंली’ कहते हैं।
   कहीं एक घना जंगल था। उस जंगल में एक ताल था और उस ताल के पास नरी-जैसी एक वन-कन्या रहती थी। उसका नाम था फयूंली।
   कोसों तक वहां आदमी का नाम न था। वह अकेली थी, बस उसके पास वनके जीव-जन्तु और पक्षी रहते थे। वे उसके भाई-बहन थे-बस प्यार से पाले-पोसे हुए। यही उसका कुटुम्ब था। वह उन सबकी अपनी-जैसी थी। हिरनी उसके गीतों में अपने को भूल जाती थी। फूल उसे घेरकर हंसते थे, हरी-भरी दूब उसके पैरों के नीचे बिछ जाती और भोर के पंछी उसे जगाने को चहचहा उठते थे। वहउनसबकी प्यारी थी।
   वह बहुत खुश थी। सुन्दर भी थी। उसके चेहरे पर चांद उतर आया था। उसके गालों में गुलाब खिले थे। उसके बालों पर घटाएं घिरी थीं। ताल के पानी की तरह उसकी जवानी भरती जा रही थी। उस रूप को न किसी ने आंखों से देखा था, न हाथों से छुआ  था।
   उस धरती पर कभी आदमी की काली छाया न पड़ी थी। पाप के हाथों ने कभी फूलों की पवित्रता को मैला न किया था। इसीलिए जिन्दगी में कहीं लोभ न था, शोक न था। सब ओर शांति और पवित्रता थी। फयूंली निडर होरक वनों में घूमती, कुंजों में पेड़ों के नये पत्ते बिछाकर लेटती, लेटकर पंछियों के सुर में अपना सुर मिलाती, फिर फूलों की माला बनाती और नदियों की कल-कल के साथ नाचने लगती। थी तो अकेली, पर उसकी जिन्दगी अकेली न थी।
   एक दिन वह यों ही बैठी थी। पास ही झरझर करता एक पहाड़ी झरना बह रहा था वहां एक बड़े पत्थर का सहारा लिए वह जलमें पैर डाले एक हिरन के बच्चे को दुलार रही थी। आंखें पानी की उठती तरंगों पर लगी थीं, पर मन न जाने किस मनसूबे पर चांदनी-सा मुस्करा रहा था। तभी किसी के आने की आहट हुई। हिरनका बच्चा डर से चौंका। फयूली नेमुड़कर देखा तो एक राजकुमार खड़ा था। कमलके फल जैसा कोमल और हिमालय की बरफ जैसा गोरा। फयूंली ने आज तक किसी आदमी को नहीं देखा था। उसे देखकर वह चांद-सी शरमा गई, फूल-सी कुम्हला गई। राजकुमार प्यासा था। मन उसका पानी में था, पर फयूली को देखते ही वह पानी पीला भूल गया। फयूंली अलग सरक गयी। राजकुमार ने अंजुलि बनायी और पानी पीने लगा। पानी पिया तो फयूंली ने राजकुमार से पूछा, “शिकार करने आये हो ?”
   राजकुमार ने कहा, “हां।”
   फयूंली बोली, “तो आप चले जाइये। यह मेरा आश्रम है। यहां सब जीव-जन्तु मेरे भाई-बहन हैं। यहां कोई किसी को नहीं मारता। सब एक-दूसरे को प्यार से गले लगाते हैं।”
   राजकुमार हंसा। बोला, “मैं भी नहीं मारूंगा। यहां खेल-खेल में चला आया था। खैर, न शिकार मिला, न अब शिकार करने की इच्छा है। इतनी दूर भटक गया हूं कि.....”
इतना कहकर राजकुमार चुप हो गया। फिर कुछ समय के लिए कोई कोई किसी से नहीं बोला। फयूंली ने आंखों की कोर से उसे फिर एक बार देखा। वह सोच न पाई कि आगे उससे क्या कहे, क्या पूछे, पर न जाने वह क्यों उसे अच्छा लगा।
यों ही उसके मुख से निकल पड़ा, “आप थके हैं। आराम कर लीजिये।”
   राजकुमार एक पत्थर के ऊपर बैठ गया। संध्या हाने लगी थी। आसमान लाल हुआ। वन में लौटते हुए पश-पक्षियों का कोलाहल गूंज उठा। देखते-ही-देखते फयूली के सामने कंद-मूल और जंगली फलों का ढेर लग गया। यह रोज की ही बात थी। रोज ही तो वन के पशु-पक्षी-उसके वे भाई-बहन-उसके लिए फल-फूल लेकर आते थे। वह उन सबकी रानी जो थी।
   राजकुमार ने यह देखा तो बाला, “वनदेवी, तुम धन्य हो! कितना सुख है यहां ! कितना अपनापन है ! काश, मैं यहां रह पाता !”
   फयूंली ने टोका, “बड़ों के मुंह से छोटी बातें शोभा नहीं देतीं। तुम यहां रहकर क्या करोगे ? राजकुमार को वनों से कया लेना-देना। उन्हें तो अपनेमहल चाहिए, बड़े-बड़े शहर चाहिए, जहां उन्हें राज करना होता है।”
   राजकुमारने कहा, “जंगल में ही मंगल है, तुम भी तो राज ही कर रही हो यहां।”
   फयूंली मुस्करा उठी। बोली, “नहीं।”
   अंधेरा हो चुका था। फयूंली ने राजकुमार का फूलों से अभिनन्दन किया ओर फिर वह अपनी गुफा में चली गई। राजकुमार भी पेड़ के नीचे लेट गया।
   सांझ का अस्त होता सूरज फिर सुबह को पहाड़ की चोटी पर आ झांका। राजकुमार जागा तो उसे घर का ख्याल आया। वह उदास हा उठा। फयूंली उसके प्राणों में खिलनेको आकुल हो उठी। अब उसका जाने का जी नहीं कर रहा था। सुबह कलेवा लेकर

फयूंली आई तो राजकुमार मन की बात न रोक सका, बाला, “एक बात कहना चाहता हूं। सुनोगी ?”



पहाड़ की चोटी पर, खेतों की मेड़ों पर, एक पीला फूल होता है। लोग उसे ‘फयूंली’ कहते हैं।
   कहीं एक घना जंगल था। उस जंगल में एक ताल था और उस ताल के पास नरी-जैसी एक वन-कन्या रहती थी। उसका नाम था फयूंली।
   कोसों तक वहां आदमी का नाम न था। वह अकेली थी, बस उसके पास वनके जीव-जन्तु और पक्षी रहते थे। वे उसके भाई-बहन थे-बस प्यार से पाले-पोसे हुए। यही उसका कुटुम्ब था। वह उन सबकी अपनी-जैसी थी। हिरनी उसके गीतों में अपने को भूल जाती थी। फूल उसे घेरकर हंसते थे, हरी-भरी दूब उसके पैरों के नीचे बिछ जाती और भोर के पंछी उसे जगाने को चहचहा उठते थे। वहउनसबकी प्यारी थी।
   वह बहुत खुश थी। सुन्दर भी थी। उसके चेहरे पर चांद उतर आया था। उसके गालों में गुलाब खिले थे। उसके बालों पर घटाएं घिरी थीं। ताल के पानी की तरह उसकी जवानी भरती जा रही थी। उस रूप को न किसी ने आंखों से देखा था, न हाथों से छुआ  था।
   उस धरती पर कभी आदमी की काली छाया न पड़ी थी। पाप के हाथों ने कभी फूलों की पवित्रता को मैला न किया था। इसीलिए जिन्दगी में कहीं लोभ न था, शोक न था। सब ओर शांति और पवित्रता थी। फयूंली निडर होरक वनों में घूमती, कुंजों में पेड़ों के नये पत्ते बिछाकर लेटती, लेटकर पंछियों के सुर में अपना सुर मिलाती, फिर फूलों की माला बनाती और नदियों की कल-कल के साथ नाचने लगती। थी तो अकेली, पर उसकी जिन्दगी अकेली न थी।
   एक दिन वह यों ही बैठी थी। पास ही झरझर करता एक पहाड़ी झरना बह रहा था वहां एक बड़े पत्थर का सहारा लिए वह जलमें पैर डाले एक हिरन के बच्चे को दुलार रही थी। आंखें पानी की उठती तरंगों पर लगी थीं, पर मन न जाने किस मनसूबे पर चांदनी-सा मुस्करा रहा था। तभी किसी के आने की आहट हुई। हिरनका बच्चा डर से चौंका। फयूली नेमुड़कर देखा तो एक राजकुमार खड़ा था। कमलके फल जैसा कोमल और हिमालय की बरफ जैसा गोरा। फयूंली ने आज तक किसी आदमी को नहीं देखा था। उसे देखकर वह चांद-सी शरमा गई, फूल-सी कुम्हला गई। राजकुमार प्यासा था। मन उसका पानी में था, पर फयूली को देखते ही वह पानी पीला भूल गया। फयूंली अलग सरक गयी। राजकुमार ने अंजुलि बनायी और पानी पीने लगा। पानी पिया तो फयूंली ने राजकुमार से पूछा, “शिकार करने आये हो ?”
   राजकुमार ने कहा, “हां।”
   फयूंली बोली, “तो आप चले जाइये। यह मेरा आश्रम है। यहां सब जीव-जन्तु मेरे भाई-बहन हैं। यहां कोई किसी को नहीं मारता। सब एक-दूसरे को प्यार से गले लगाते हैं।”
   राजकुमार हंसा। बोला, “मैं भी नहीं मारूंगा। यहां खेल-खेल में चला आया था। खैर, न शिकार मिला, न अब शिकार करने की इच्छा है। इतनी दूर भटक गया हूं कि.....”
इतना कहकर राजकुमार चुप हो गया। फिर कुछ समय के लिए कोई कोई किसी से नहीं बोला। फयूंली ने आंखों की कोर से उसे फिर एक बार देखा। वह सोच न पाई कि आगे उससे क्या कहे, क्या पूछे, पर न जाने वह क्यों उसे अच्छा लगा।
यों ही उसके मुख से निकल पड़ा, “आप थके हैं। आराम कर लीजिये।”
   राजकुमार एक पत्थर के ऊपर बैठ गया। संध्या हाने लगी थी। आसमान लाल हुआ। वन में लौटते हुए पश-पक्षियों का कोलाहल गूंज उठा। देखते-ही-देखते फयूली के सामने कंद-मूल और जंगली फलों का ढेर लग गया। यह रोज की ही बात थी। रोज ही तो वन के पशु-पक्षी-उसके वे भाई-बहन-उसके लिए फल-फूल लेकर आते थे। वह उन सबकी रानी जो थी।
   राजकुमार ने यह देखा तो बाला, “वनदेवी, तुम धन्य हो! कितना सुख है यहां ! कितना अपनापन है ! काश, मैं यहां रह पाता !”
   फयूंली ने टोका, “बड़ों के मुंह से छोटी बातें शोभा नहीं देतीं। तुम यहां रहकर क्या करोगे ? राजकुमार को वनों से कया लेना-देना। उन्हें तो अपनेमहल चाहिए, बड़े-बड़े शहर चाहिए, जहां उन्हें राज करना होता है।”
   राजकुमारने कहा, “जंगल में ही मंगल है, तुम भी तो राज ही कर रही हो यहां।”
   फयूंली मुस्करा उठी। बोली, “नहीं।”
   अंधेरा हो चुका था। फयूंली ने राजकुमार का फूलों से अभिनन्दन किया ओर फिर वह अपनी गुफा में चली गई। राजकुमार भी पेड़ के नीचे लेट गया।
   सांझ का अस्त होता सूरज फिर सुबह को पहाड़ की चोटी पर आ झांका। राजकुमार जागा तो उसे घर का ख्याल आया। वह उदास हा उठा। फयूंली उसके प्राणों में खिलनेको आकुल हो उठी। अब उसका जाने का जी नहीं कर रहा था। सुबह कलेवा लेकर

फयूंली आई तो राजकुमार मन की बात न रोक सका, बाला, “एक बात कहना चाहता हूं। सुनोगी ?” 
फयूंली ने पूछा, “क्या ?”
   राजकुमार कुछ झिझका, पर हिम्मत करके बोला, “मेरे साथ चलोगी ? मैं तुम्हें राजरानी बनाकर पूजूंगा।”
   फयूंली ने कहा, “नहीं, रानी बनकर मैं क्या करूंगी।”
राजकुमार ने कहा, “मैं तुम्हें प्यार करता हूं। तुम्हारे बिना जी नहीं कसता।”
   फयूंली ने जवाब दिया, “पर वहां यह वन, ये पेड़, ये फूल, ये नदियां और ये पक्षी नहीं होंगे।”
   राजकुमार ने कहा, “वहां इससे भी अच्छी-अच्छी चीजें हैं। मेरे राजमहल में हर तरह से सुख से रहोगी। यहां वन में क्या रखा है !”
   फयूंली ने कहा, “आदमी ने अपने लिए एक बनावटी जिन्दगी बना रखी है। उसे मैं सुख नहीं मानती।”
   राजकुमार इसका क्या जवाब देता ! फयूंली ने सोचा-इतनी सुंदरता, इतना प्यार, सचमुच मुझे आदमियों के बीच कहां मिलेगा ? आदमी एक-दूसरे को सुखी बनाने के लिए संगठित जरूर हुआ है, पर वही सहंगठन उसके दु:खों का कारण भी है। आज मैं अकेली हूं, पर मेरे दिल में डाह नहीं है, कसक नहीं है। पर वहां? वहां इतना खुलापन कहां होगा।
   पर उसके भीतर बैठा कोई उससे कुछ और भीकह रहा था। आखिर नारी को सुहाग भी तो चाहिए। यौवन में लालसा हाती ही है।
   वह एकदम कांप उठी; पर अंत में उसकी भावना उसे राजकुमार के साथ खींच ले ही गई।उसने राजकुमार की बात मान ली।
   फिर क्या था ! वे दोनों उसी दिन चल पड़े। पशु-पक्षी आये। सबने उन्हें विदा दी। उनकी आंखों में आंसू थे।
   राजकुमार उसे लेकर अपने राज्य में पहुंचा। दानों बेहद खुश थे। वह अब रानी थी। राजकुमार उसे प्रणों से ज्यादा प्यार करता था। वहां वन से भी ज्यादा सुख था। राजमहल में भला किस बात की कमी हो सकती थी ! खाने के लिए तरह-तरह के भोजन थे, सेवा के लिए दासियां ओर दिल बहलाने कि लिए नर्तकियां। यही नहीं, दिखाने के लिए ऐश्वर्य और जताने के लिए अधिकार था।
   दिन बीतते गये। सुबह का सूरज शाम को ढलता रहा। कई दिनों तक उसके भाई-बहन उसे याद करते रहे। पर वही तो गई थी, बाकी जो जहां था, वहीं था। कुछ दिन बाद पंछी पहले की तरह बोलने लगे, फूल फूलने लगे।
   पर एक दिन फयूंली को लगा, जैसे उसके जीवन की उमंग खो गई हो।
राजमहल में हीरे ओर मोतियों की चमक जरूर थी, पर न फूलों का-सा भोलापन ,था और न पंछियों की-सी पवित्रता थी। अब राजमहलकी दीवारें जैसे उसकी सांस घोटे दे रही थीं।उसे लगता, जैसे वह वनउसे पुकार रहा है। अब उसके पास उसके भाई-बहन कहां थे? आदमी थे, डाह थी, लोभ था, लालच था। पर वह तो निर्मल प्यार की भूखी थी।
   फिर उस जीवन में उसके लिए कोई रस न रहा। वह उदास रहने लगी। उसे एकांत अच्छा लगने लगा। राजकुमार नेउसे खुश करने की लाख कोशिशें कीं, पर उसका कुम्हलाया मन हरा न हो सका। कुछ दिन में उसकी तबीयत खराब हो गई और वह बिस्तर पर जा पड़ी।
    थोड़ी ही दिनों में उसका चमकता चेहरा पीला पड़ गया। वह मुरझा गई। किसी पौधे को एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह लगा देने की कोशिश बेकार गई। उसके जीने की अब कोई आशा न रही।
   एक दिन उसने राजकुमार से कहा, “मैं अब नहीं जीऊंगी। मेरी एक आखिरी चाह है। पूरी करोगे?”
   राजकुमार ने कहा, “जरूर।”
   फयूंली ने लम्बी सांस लेते हुए कहा, “कभी अगर शिकार को जाओ तो मेरे वन के उन भाई-बहनों को मत मारना और जब मैं मर जाऊं तो मुझे पहाड़ की उसी चोटी पर गाड़ देना, जहां वे रहते हैं।”
   इसके बाद, उसके प्राण पखेरू उड़ गये।
   राजकुमार ने उसे उसी पहाड़ की चोटी पर गाड़कर उसकी आखिरी इच्छा पूरी की। वन के पशु-पक्षियों ने-उसके उन भाई-बहनों ने-सुना तो बड़े दु:खी हुए। हवा ने सिसकी भरी, फल गिर गये और लताएं कुम्हला उठीं। राजकुमार मन मसोसकर रह गया।
   आदमी ही मरते हैं। धरती सदा अमर है। एक ओर पेड़ सूखता है, दूसरी ओर अंकुर फूटते हैं। इसी का नाम जिन्दगी है। कुछ दिन बाद फिर प्राणों की एक सिसकी सुनाई दी। पहाड़ की चोटी पर, जहां फयूंली गाड़ दी गई थी, वहां पर एक पौधा और उस पर एक सुन्दर-सा फूल उग आया और लोग उसे फयूंली कहने लगे।